Old Testament
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लूका 9:1 लूका 9:2 लूका 9:3 लूका 9:4 लूका 9:5 लूका 9:6 लूका 9:7 लूका 9:8 लूका 9:9 लूका 9:10 लूका 9:11 लूका 9:12 लूका 9:13 लूका 9:14 लूका 9:15 लूका 9:16 लूका 9:17 लूका 9:18 लूका 9:19 लूका 9:20 लूका 9:21 लूका 9:22 लूका 9:23 लूका 9:24 लूका 9:25 लूका 9:26 लूका 9:27 लूका 9:28 लूका 9:29 लूका 9:30 लूका 9:31 लूका 9:32 लूका 9:33 लूका 9:34 लूका 9:35 लूका 9:36 लूका 9:37 लूका 9:38 लूका 9:39 लूका 9:40 लूका 9:41 लूका 9:42 लूका 9:43 लूका 9:44 लूका 9:45 लूका 9:46 लूका 9:47 लूका 9:48 लूका 9:49 लूका 9:50 लूका 9:51 लूका 9:52 लूका 9:53 लूका 9:54 लूका 9:55 लूका 9:56 लूका 9:57 लूका 9:58 लूका 9:59 लूका 9:60 लूका 9:61 लूका 9:62



निचोड़: यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपना प्राण खो दे—तो क्या लाभ?
यूहन्नी-यात्रा की तरह जीए हुए जीवन में संसारिक सफलता और आत्मीय उद्देश्य के बीच एक pungent प्रश्न उभरता है: अगर कोई व्यक्ति सभी सांसारिक लाभ पा ले, परन्तु अपना प्राण गंवा दे, तो उसका वास्तविक लाभ क्या है? लूका 9:25 यह बताता है कि टिके रहने के लिए बाह्य संपन्नता से अधिक महत्वपूर्ण वही है जो आत्मा के लिए जीवन देता है।
प्रसंग की पृष्ठभूमि
यूहन्नी-प्रकाश में यीशु अपने शिष्यों से यह पूछते हैं कि मनुष्य यदि संसार को सब कुछ पा ले, परन्तु आत्मिक स्थिति खो दे, तो उसका क्या लाभ? यह उद्घाटन सांसारिक मूल्यांकन की नाकामी पर दृष्टि देता है: बाहरी समृद्धि आंतरिक शांति और ईश्वर-संबंध को प्रतिस्थापित नहीं कर सकती।
व्याख्यात्मक बिंदु
छः संक्षिप्त विचार
संबद्ध पवित्र ग्रंथ के संदर्भ
1) मत्ती 16:26 में कहा गया है कि मनुष्य यदि संसार के सभी लाभ प्राप्त करता है परन्तु अपनी प्राण खो देता है, तो उसका क्या लाभ होगा? यह प्रस्थान आत्मा के मूल्य की पुनर्रचना देता है।
2) मरकुस 8:36-37 यह बताता है कि क्या लाभ यदि किसी को सभी संसार मिल जाए, परन्तु उसकी आत्मा को नुकसान हो जाए? दृष्टांत से स्पष्ट होता है कि आत्मा का नुकसान अनमोल है।
3) लूका 12:15-21 पृथ्वी-धन की अस्थायित्वता और एक धनी Fool का उपदेश दर्शाता है कि जीवन की वास्तविक समृद्धि कहाँ है।
आचार्य-मत का संक्षेप
फरिश्ता-सम्पादन में ऐसे विचार मिलते हैं कि जीवन का सार परमेश्वर के साथ संबंध में है। लेकिन यह भी याद दिलाता है कि संसार-लाभ के प्रति सचेत रहना है; यह न मान लेना कि धन और प्रतिष्ठा स्वयं में शांति दे देंगे।
व्यावहारिक निष्कर्ष
जो अपना जीवन ईश्वर के उद्देश्य के अनुसार जीना चाहता है, उसे सांसारिक सफलताओं के बावजूद भी आत्म-जीवन का मूल्य समझना चाहिए। अपने दिल को ऐसे प्राथमिकताओं में लगाइए जो ईश्वर के राज्य के लिए फायदेमंद हों।