Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 9:1 लूका 9:2 लूका 9:3 लूका 9:4 लूका 9:5 लूका 9:6 लूका 9:7 लूका 9:8 लूका 9:9 लूका 9:10 लूका 9:11 लूका 9:12 लूका 9:13 लूका 9:14 लूका 9:15 लूका 9:16 लूका 9:17 लूका 9:18 लूका 9:19 लूका 9:20 लूका 9:21 लूका 9:22 लूका 9:23 लूका 9:24 लूका 9:25 लूका 9:26 लूका 9:27 लूका 9:28 लूका 9:29 लूका 9:30 लूका 9:31 लूका 9:32 लूका 9:33 लूका 9:34 लूका 9:35 लूका 9:36 लूका 9:37 लूका 9:38 लूका 9:39 लूका 9:40 लूका 9:41 लूका 9:42 लूका 9:43 लूका 9:44 लूका 9:45 लूका 9:46 लूका 9:47 लूका 9:48 लूका 9:49 लूका 9:50 लूका 9:51 लूका 9:52 लूका 9:53 लूका 9:54 लूका 9:55 लूका 9:56 लूका 9:57 लूका 9:58 लूका 9:59 लूका 9:60 लूका 9:61 लूका 9:62



मुख्य interpretive बिंदु
लूका 9:31 में यीशु के सम्मानपूर्ण रूप-रूप के साथ उनके अवरोधित भविष्य की चर्चा एक ऐसे क्षण में दिखाई देती है जब तीन करीबी शिष्य उन्हें देखकर मोहक प्रकाश में उजागर होते हैं। यह दृश्य हमारे लिए भविष्य की पीड़ा के साथ महिमा के संगम को दिखाता है: वहां मौजूद महिमा और मृत्यु का आशय एक साथ सामने आता है। मरने की चर्चा इसलिए है ताकि यीशु का उद्देश्य और उसकी संदेशवाहक यात्रा की संपूर्ण योजना स्पष्ट हो सके: ईश्वर की योजना के अनुसार पाप के लिए उद्धार का मार्ग खुलना है।
सामग्रीगत संदर्भ (लिटरेरीContext)
यह प्रसंग पहचाने जाते समय दो प्रमुख ट्रैक दिखते हैं: (1) यीशु की महिमा-अनुभूति और उनकी मृत्यु-योजना का संयुक्त प्रकटीकरण। (2) त्याग-आश्रय के बारे में ज्ञान देने के तरीकों की अपेक्षा—पृथ्वीवादी कलिसया-यात्रा के बीच मौन स्वर्गीय दृष्टि। लूका यह दर्शाता है कि यीशु एक दुखद yet महिमान्वित मार्ग पर है, ताकि शिष्य और पाठक यह समझें कि महिमा और वेदना एक साथ चलते हैं, और ईश्वर की बही-खाता यही है।
धर्मशास्त्रीय महत्व
यह घटना हमें चारों ओर के संदर्भों में पुल बनाती है: पहला, कुछ पवित्र पर्वते जहाँ परमेश्वर के पैगम्बरों के जीवन-यात्रा में मृत्यु का पूर्वाभास मिलता है; दूसरा, मसीह की मृत्यु और पुनर्जीवन की योजना स्पष्ट करने के लिए उनके भविष्य की महिमा का संकेत; तीसरा, शिष्य-निष्ठा की परीक्षा—क्या वे विपदा के समय भी विश्वास में स्थिर रहेंगे? और अंत में, यह कि मोहित आकाशीयGlory से आया संदेश पृथ्वी पर उद्धार के लिए एक नयी दिशा देता है।
तत्वमीक स्वीकार्यता ( theological significance )
यहीं पर सुसमाचार-यात्रा के भीतर एक गहन सिद्धान्त उभरता है: परमेश्वर की योजना को पवित्र पुत्र की मृत्यु के माध्यम से पूरा किया जाना है—यह मृत्यु से पहले महिमा का घोषण है ताकि विश्वासी समझें कि निष्ठा और समर्पण ही उद्धार की कुंजी है। लूका विशेष रूप से यह दिखाता है कि ईश्वर का रवैया शुद्ध प्रेम और आत्म-त्याग का है, न कि उस पृथ्वीवादी सौदे का जिसमें सिर्फ शक्तिशाली विजयी दिखते हैं।
क्रॉस-रेफरेंस (Cross-references) और उनके अर्थ
इन संदर्भों से संकेत मिलता है कि महिमा-प्राप्ति और पाप के उद्धार के बीच एक अनिवार्य संतुलन है, जिसे यीशु ने अपने क्रॉस-यात्रा द्वारा स्थापित किया है।
विचारोन्मुख प्रश्न (Reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह वाक्य हमें समझाता है कि मसीह की मृत्यु की योजना महिमा के प्रकाश में प्रस्तुत होती है, ताकि विश्वासी यह जानें कि उद्धार एक समर्पित और नियोजित मार्ग है। महिमा और विवशता एक साथ चलते हैं, ताकि संसार को नया जीवन मिले। यह दृष्टिकोण हमें यह भी सिखाता है कि पीड़ा के बीच ईश्वर की नियत महिमा को पूर्ण करती है।
महत्त्वपूर्ण उद्धरण चिह्नित संकेत—Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से प्रत्यक्ष संकेतन उपलब्ध रहे तो नीचे दिए जाते हैं; यदि उपलब्ध न हो तो सामान्य सार यहाँ जोड़ा गया है:
या तो उपरोक्त टिप्पणी के भीतर सीधे उद्धरण नहीं पाए जाते, पर इन टिप्पणीकारों के विचारों के अनुसार, यीशु के महिमा-घटना के साथ मृत्यु की चर्चा यह दर्शाती है कि उद्धार के मार्ग में त्रुटिहीन विश्वास और समर्पण आवश्यक है।