Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 16:1 मत्ती 16:2 मत्ती 16:3 मत्ती 16:4 मत्ती 16:5 मत्ती 16:6 मत्ती 16:7 मत्ती 16:8 मत्ती 16:9 मत्ती 16:10 मत्ती 16:11 मत्ती 16:12 मत्ती 16:13 मत्ती 16:14 मत्ती 16:15 मत्ती 16:16 मत्ती 16:17 मत्ती 16:18 मत्ती 16:19 मत्ती 16:20 मत्ती 16:21 मत्ती 16:22 मत्ती 16:23 मत्ती 16:24 मत्ती 16:25 मत्ती 16:26 मत्ती 16:27 मत्ती 16:28



मत्ती 16:14 — नतीजे की दिशा: यीशु के लोग क्या कहते हैं?
पद का संदर्भ: इस भाग में यीशु के पीछे के क्षेत्रीय संवादों के क्रम में फरीसियों और छात्र-चट्ठों के साथ बातचीत चल रही है। पंक्ति-वार चर्चा के बीच, प्रेरितों ने यह पूछा कि लोग यीशु के बारे में क्या कहते हैं। इस विश्लेषण में यही पूछा गया प्रश्न उठा है कि यहाँ लोग किस प्रकार ईश्वर की योजना और उद्धारकर्ता की पहचान को देखते हैं।
पठ पाठ का तत्काल सेटिंग
यह वाक्य बताता है कि लोगों की सोच तथा धार्मिक नेताओं की राय किस प्रकार यीशु के व्यक्तित्व और मिसाले के साथ जुड़ती है। येरूशलेम से बाहर के गाँव-गाँव में, लोग अलग-अलग हवाओं के साथ यीशु की पहचान पर विचार कर रहे थे। यह उनकी अपेक्षाओं और धार्मिक पूर्वाग्रहों का प्रतिबिंब है—कि उद्धारकर्ता किस रूप में आएगा और कौन-सी ऐतिहासिक योषाओं की प्रतिज्ञाओं को पूरा करेगा।
यह पाठ क्या बताता है about God या faith
यह verse यह संकेत देता है कि परमेश्वर के कार्य की योजना मानव समझ से परे है। विश्वास की दृष्टि से, लोग उद्धारकर्ता की एक विशिष्ट, मानक पहचान चाहते हैं—यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला, एलिय्याह, यिर्मयाह, या अन्य कोई भविष्यद्वक्ता। परन्तु यीशु यह दिखाते हैं कि परमेश्वर के उद्घोष और उद्धार की योजना गतिशील है, कभी-कभी सत्ता-युक्त, तो कभी विनम्र, पर हमेशा सत्य के रोशनी में प्रकट होती है। इस पाठ से यह शिक्षा मिलती है कि विश्वस्त व्यक्ति को ईश्वर के रहस्य की विशालता में विश्वास रखना चाहिए, न कि मन में बने पूर्व-निर्धारित विचारों पर।
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Related cross-references (संयोगी पाठ) और उनका छोटा विवेचन
1) मत्ती 11:14 — “जो मम्मी दूँगा वह यीशु नहीं, परन्तु द्वार-परमेश्वर द्वारा यह कहा गया है कि एलिय्याह आ जाएगा”—यह संदर्भ उस विचार को पुष्ट करता है कि उद्धारकर्ता की पहचान विविध रूपों में कल्पना की जाती है, पर परमेश्वर की योजना भिन्न दिशा में खुलती है।
2) मन्ना 24:5 — “क्योंकि कई आयेंगें और अपने-अपने नाम लेकर आएँगे, कहेंगे मैं मसीह हूँ”—यह प्रचलित विचार दर्शाता है कि लोकतांत्रिक मान्यताओं में Messiah की पहचान विविध हो सकती है, पर सृजनहार की योजना एकदम स्पष्ट होती है।
3) यूहन्ना 1:21 — “यहोशू यह पंक्ति पूछते हैं, तो क्या आप मसीह हैं?”—यह संकेत देता है कि उद्धारकर्ता की पहचान जनता के भीतर कैसे प्रश्न बनती है, और उसका उत्तर किस तरह जीवित विश्वास में प्रकट होता है।
आज के समय के लिए अनुप्रयोग
आप कैसे श्रोत बनते हैं? यह टेक्स्ट स्मरण दिलाता है कि विश्वास के लिए शंका और विविध विचार आम हैं, पर हमें परमेश्वर के कार्यों की गहराई पर टिकना चाहिए। जब दुनिया उद्धार के रूप में एक विशिष्ट स्वरूप की आशा रखती है, तब भी परमेश्वर का योजना निर्बाध है। यीशु के साथ विश्वास का अर्थ है—उद्धारकर्ता को उसके स्थान और रूप में न बांधना, बल्कि उसके शास्त्र और आत्मा के अनुसार जीवन जीना।
संक्षेप सार
इस verses में दिखाया गया है कि लोग मसीह के बारे में अपनी आप की धारणाओं के अनुसार परिणाम चाहते हैं, पर परमेश्वर की योजना अधिक विस्तृत है। आपसी समझ की सीमा से ऊपर उठकर, हमें परमेश्वर की सच्ची पहचान पर टिकना चाहिए और यीशु में विश्वास को जीवनचर्या बनाना चाहिए।
नोट: इस commentary में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों से आवश्यक संकेत समाहित हैं।