Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 16:1 मत्ती 16:2 मत्ती 16:3 मत्ती 16:4 मत्ती 16:5 मत्ती 16:6 मत्ती 16:7 मत्ती 16:8 मत्ती 16:9 मत्ती 16:10 मत्ती 16:11 मत्ती 16:12 मत्ती 16:13 मत्ती 16:14 मत्ती 16:15 मत्ती 16:16 मत्ती 16:17 मत्ती 16:18 मत्ती 16:19 मत्ती 16:20 मत्ती 16:21 मत्ती 16:22 मत्ती 16:23 मत्ती 16:24 मत्ती 16:25 मत्ती 16:26 मत्ती 16:27 मत्ती 16:28



मत्ती 16:21 का निकट-परिप्रेक्ष्य और पाठ का संदेश
पद का आरम्भ यहाँ यीशु अपने चेलों के साथ सतर्क-चित्त रहते हैं, यह संकेत देता है कि उनका मिशन अब एक निर्णायक मार्ग पर आ पहुँचा है। वे स्पष्ट करते हैं कि उन्हें यरूशलेम जाना है, जहाँ प्राचीनों और प्रधान याजकों तथा शास्त्रियों के हाथ से दुःख उठाना पड़ेगा, मार डाला जाएगा, और तीसरे दिन जी उठेंगे। यह वक्तव्य उनकी मृत्यु और पुनर्जीवन की पूर्व-कथित योजना को उद्घाटित करता है, जो उनके शिष्य-समूह के लिए एक कठिन-परिष्कृत पाठ है।
ईश्वर-विश्वास और उद्धार की योजना
यह वाक्य ईश्वर की पूर्ण योजना और प्रयोग का संकेत देता है। यीशु स्वयं उस मार्ग को स्वीकार कर रहे हैं जो पश्चिमी समाज के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण और डरावना प्रतीत होता है—दुःख, क्रूरता, और मृत्यु तक की राह—परन्तु यह मार्ग उद्धार के लिए आवश्यक है। इस बात से विश्वास मजबूत होता है कि भगवान का उद्धार-कार्य कठिनाइयों के बावजूद पूरा होता है; बंधनों को तोड़कर जीवन का नया स्वरूप प्रस्तुत होता है।
शब्दावलि और प्रतीक
इस वाक्य में “हूँ” और “जी उठूँगा” जैसे शब्द दो प्रमुख विचारों को रेखांकित करते हैं: दुःख एक मार्ग है, पर उसमें अंततः विजय है। “यरूशलेम” धार्मिक राजधानी के रूप में भगवान के उद्धार के क्रियात्मक निर्णय का दृश्य है—जहाँ प्रतिरोध और विरोध के बीच से ईश्वर की योजना आगे बढ़ती है।
से सम्बन्धित पाठ
- पतरस के उद्धारण में यीशु की भविष्य-वाणी से उनके दायित्व और प्रेरणाएँ स्पष्ट होती हैं।
- यीशु के क्रूस पर चढ़ाये जाने की पूर्वसूचना अन्य गाथाओं में भी मिलती है, जो दिखाती है कि मृत्यु और पुनर्जीवन ईश्वर के राज्य का अविभाज्य हिस्सा हैं।
- पुनर्जीवन की उम्मीद, ख्रीस्तीय विश्वास की आधारशिला बनती है कि दुःख के भीतर भी भगवान की योजना काम कर रही है।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में) और तर्क
इन संदर्भों से ज्ञात होता है कि दुख-भोग के बावजूद ईश्वर की कृपा और उद्धार की दिशा कभी रुकती नहीं; यह आशा का स्रोत है जो विश्वासियों को कठिनाइयों में भी टिके रहने की प्रेरणा देती है।
आज के संदर्भ में आवेदन
1) कठिन निर्णयों में भी ईश्वर की योजना के प्रति विश्वास बनाए रखें, भले ही परिणाम अभी स्पष्ट न हों।
2) जीवन के दुखद अनुभवों के बीच भी पुनर्जीवन और नई शुरुआत की संभावना को याद रखें—विश्वास का यही केंद्र है।
3) समुदाय में आपसी मदद और प्रभु के संदेश को साझा करें ताकि दूसरे भी इस योजना के भीतर आशा पाएं।
उद्धरण योग्य संक्षेप (महत्वपूर्ण विचार):
“मुझे अवश्य है, कि यरूशलेम को जाऊँ, और प्राचीनों और प्रधान याजकों और शास्त्रियों के हाथ से बहुत दुःख उठाऊँ; और मार डाला जाऊँ; और तीसरे दिन जी उठूँ।”
नोट: इस पाठ के विभिन्न प्राचीन टिप्पणीकारों के निष्कर्षों में यीशु की मृत्यु-यात्रा को उद्धार के लिए अनिवार्य मार्ग माना गया है।