Old Testament
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नीतिवचन 26:1 नीतिवचन 26:2 नीतिवचन 26:3 नीतिवचन 26:4 नीतिवचन 26:5 नीतिवचन 26:6 नीतिवचन 26:7 नीतिवचन 26:8 नीतिवचन 26:9 नीतिवचन 26:10 नीतिवचन 26:11 नीतिवचन 26:12 नीतिवचन 26:13 नीतिवचन 26:14 नीतिवचन 26:15 नीतिवचन 26:16 नीतिवचन 26:17 नीतिवचन 26:18 नीतिवचन 26:19 नीतिवचन 26:20 नीतिवचन 26:21 नीतिवचन 26:22 नीतिवचन 26:23 नीतिवचन 26:24 नीतिवचन 26:25 नीतिवचन 26:26 नीतिवचन 26:27 नीतिवचन 26:28


नीतिवचन 26:10 का सीधे शब्दों में अर्थ
जो नासमझ कर्मों से दूसरों को नुकसान पहुँचाता है, वैसा ही वह तीरन्दाज है जो अकारण सबको मार डालता है। यहाँ हिंसक या बेमतलब कुश्चिकारी व्यवहार को निशाने से दूर नहीं किया गया है; बल्कि वह कर्म जो दूसरों की बुद्धि, समय और जीवन को व्यर्थ गंवा देता है, उसे मूर्खता और दुष्कर्म के समान माना गया है।
पृष्ठभूमि और सन्दर्भ
नीतिवचन सतत व्यावहारिक नैतिक शिक्षा देता है: किस प्रकार बुद्धिमानी से जीवन के कार्य संचालित हों। यह पूरी किताब एक शिक्षक की तरह व्यवहारिक नियमों को बताती है, जिसमें नापतोल, विवेक और समाज के साथ सही संबंध बनाए रखना प्रमुख है। इस श्लोक में एक ऐसी मिसाल दी गयी है कि बिना वजह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नुकसान पहुँचाने वाला कर्मी कौन है—तैराती चाल से भी अधिक नुकसान पहुँचाने वाला।
आऱम्भिक विश्लेषण
- मूर्खता: जो बिना सोचे-समझे कदम उठाता है वह दूसरों के समय, उर्जा और संसाधनों को बर्बाद कर देता है।
- दायित्व का अभाव: ये कर्मी सामाजिक दायित्व और नैतिकता से भागते हैं, परिणामस्वरूप समुदाय में अव्यवस्था बढ़ती है।
- व्यावहारिक नुकसान: नीतिवचन यहाँ दिखाता है कि ऐसी हरकतें अंततः खुद इनके लिए भी हानिकारक होती हैं—यह तीरन्दाज के समान है जो सबको नुकसान पहुँचाता है, अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँचना देता।
interpretive observations
संकेतक विचार: छोटा-सा सार
अन्य प्रासंगिक पद
1 कुरिन्थियों 13: hinzufügen—धैर्य और प्रेम के बिना शारीरिक प्रयास भी व्यर्थ हो सकता है; प्रकृति का सम्मान करें ताकि न लौट सके नुकसान।
नीतिवचन 19:5—झूठे गवाह के लिए दंड; परिश्रमहीनता से भी नुकसान होता है।
प्रत्यक्ष संदर्भ—जो अविराम और अकारण हानि पहुँचाता है, वह समाज में अविश्वास बनाता है; बुद्धिमान लोग ऐसे कर्मों से बचते हैं और दूसरों की मदद में समय लगाते हैं।
हिंदी-तकनीकी निष्कर्ष
यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि जीवन में सही और गलत के बीच चयन कैसे किया जाए। मूर्खता वह है जो बिना कारण दूसरों के समय और मेहनत को हाथ की मेहँत से छीन ले। विवेक और नैतिकता की सतह पर खड़े होकर हम न केवल अपनेलाभ की रक्षा करते हैं, बल्कि समुदाय में विश्वास, सहयोग और संतोष भी बढ़ाते हैं।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में)
उद्धृत संकेतों से जुड़े विचारों में—नीतिवचन 19:5, 1 कुरिन्थियों 13:3, और याकूब 4:13-15—प्रेरणा मिलती है कि बिना सोच-विचार के किया गया कर्म या दूसरों के समय के दुरुपयोग से कैसे निरर्थकता आती है और जीवन के उद्देश्य पर प्रश्न खड़े होते हैं।
संक्षिप्त व्यवहारिक निष्कर्ष
उद्धृत प्रवचन का सार यह है कि जीवन के छोटे-छोटे निर्णय भी सामाजिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत चरित्र पर प्रभाव डालते हैं। सही विवेक और संयम से ही हम दूसरों के प्रति न्याय और पसंद-नापसंद में संतुलन बनाए रखते हैं।
नोट: नीचे उद्धृत क्लासिक टिप्पणीकारों के संक्षेप विचारों के अनुसार, पहले से प्रसिद्ध व्याख्याएं इसे व्यावहारिक रहते हुए बेहतर समझाती हैं—परन्तु यहाँ सभी संदर्भ एक समेकित, सहज प्रवाह में प्रस्तुत हैं, ताकि पाठक सरल भाषा में गहराई समझ सकें।
मैथ्यू हेनरी (Matthew Henry) से संक्षिप्त संदर्भ: मूर्खता वह है जो दूसरों के समय-श Resources को अनावश्यक क्षति पहुँचाती है; विवेक के बिना की गई गतिविधियाँ समाज को नुकसान पहुँचाती हैं।
एल्बर्ट बार्न्स (Albert Barnes) से संक्षिप्त संदर्भ: इस श्लोक का मूल उद्देश्य मानव के कर्म-प्रकार पर है, ताकि हर कोई अपने आचरण पर नियंत्रण रखे और समाज में प्रगति हो।
एडम क्लार्क (Adam Clarke) से संक्षिप्त संदर्भ: यह तीर जैसी तुलना अप्रत्यक्ष तौर पर बताती है कि अनावश्यक क्रियाएं किस प्रकार अन्य के लिए बोझ बनती हैं और खुद भी नुकसान में रहती हैं।