Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीतियों के ज्ञान का पाठ: नीतिवचन 26:27
पद: जो गड्ढ़ा खोदे, वही उसी में गिरेगा, और जो पत्थर लुढ़काए, वह उलटकर उसी पर लुढ़क आएगा।
Immediate setting
यह वचन एक ठोस, कौशलपूर्ण चेतावनी का भाग है जिसमें नीति-विदों ने व्यवहारिक बोध दिया है कि किसी के उकसावे, चालाकी या छल-छद्म के परिणाम अंततः उसी के ऊपर लौटते हैं। मूर्त-प्रत्यावर्तन का यह सिद्धांत “क्रिया के परिणाम” के रूप में हर प्रकार की चालाकी के लिए चेतावनी बनकर रहता है।
गुण और विश्वास में इसका संदेश
यह आयत परमेश्वर के न्याय के नियम को दर्शाती है: जो किसी के साथ छल, फरेब या घमंड के साथ व्यवहार करता है, उसकी नापाक योजना सबसे पहले उसी के विरुद्ध जा कर पड़ती है। यह दिलासा देता है कि दुष्टता एक नाली में बहती नहीं रहती; उसका परिणाम स्वयं उसे प्रभावित करता है। इसका मूल विश्वास यह कि ईश्वर सत्यनिष्ठ है और जो लोग दूसरों को नुकसान पहुँचाने की चाल चलते हैं, वे अंततः अपनी चाल के बराबर दंड पाते हैं।
प्रमुख शब्दों/छवि की क्लारिफिकेशन
अन्य प्रचलित अभिमत: स्पष्टता के साथ
यह विचार: “जो आप किसी पर डालेंगे, वही आपकी देह पर वापस आता है”—यह पुराने सार्वजनिक-डॉरट टिप्पणीकारों के बीच पक्का अनुभव है। नीचे के संदर्भ इस सिद्धांत को और गहराई से जोड़ते हैं:
- मर्दानी दृष्टि से मथयूहं ने कहा कि चतुराई से किए गए अपराध अंततः शनैः शनैः स्वयं को ही नुकसान पहुँचाते हैं।
- अर्बन बर्न्स और ऐडम क्लार्क ने इन प्रकार के नैतिक नियमों को दैनिक व्यवहार के ढांचे में समझाने की कोशिश की है ताकि व्यक्ति अपने आचरण पर नियंत्रण रखे।
सीधे तात्पर्य से संबद्ध अन्य आयतें
हमें यह विचार बारम्बार मिलता है कि नीयत यदि गलत हो तो परिणाम भी क्षति पहुँचाते हैं—जैसे कि "जो दूसरों को नीचा दिखाता है, वही कहीं नीचे गिरता है" जैसा अंदेशा। साथ ही, सत्य और न्याय की राह में ईश्वर के निर्देशों के अनुसार वचन पर टिके रहना ही बुद्धिमत्ता है।
आज के लिए व्यवहारिक अनुप्रयोग
Cross-references और उनका संक्षिप्त स्पष्टीकरण
1) नीतिवचन 10:2 — व्यर्थ संपत्ति से वास्तविक लाभ नहीं बनता; न्यायसंगत उपाय ही स्थिर धरोहर है।
2) मत्ती 7:2 — जैसे नाप-तौल से दूसरों पर माप-तौल करते हैं, उसी अनुसार आपको भी मापेंगे; नीयत और कर्म की समानता इस आयत के अनुरूप है।
3) रोमख 12:17-19 — प्रतिशोध न दें; परंतु शांत और उचित मार्ग से बुरे का अंतःकरण ठीक करें; यह भी इस आयत के नैतिक संदेश को पुष्ट करता है।
सार-सार
नीतिवचन 26:27 हमें सचेत करता है कि दुष्कर्म के रास्ते ठहरते नहीं; वह स्वयं उसी को गिराता है जो उसे अपनाता है। यह परमेश्वर के न्याय पर आधारित कटु लेकिन स्पष्ट नियम है: जो कर्म करेगा, वही फल देगा; और जो दूसरों के नुकसान के लिए चाल चलता है, वही अंततः 자신의 गिरावट का कारण बनता है।
उद्धरण नोट: इस उत्तर में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के स्पष्ट उद्धरण यदि उपलब्ध हों तो संक्षेप में प्रयुक्त हैं; परन्तु मूल पाठ से मिलते-जुलते विचार ही paragraphed रूप में समाहित हैं।