Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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पाठ का संक्षिप्त परिचय
नीतिवचन 26:11 में कहा गया है कि जैसा कुत्ता अपनी छनकी-छाँट (लौटा) को चाटता है, वैसे ही मूर्ख अपनी मूर्खता को बार-बार दोहराता है। यह उपमा स्पष्ट रूप से दिखाती है कि अज्ञान और जिद्दीपन कैसे असत्य और निहित खतरे को जन्म देता है। नीतिवचन में अक्सर आचरण के प्रतिफल और मनो-वृत्ति की ताकत पर जोर देते हुए बुद्धिमानी की राह प्रस्तुत की गई है; यहाँ एक कटाक्षपूर्ण चित्र से पाठक यह समझ पाए कि यदि कोई सुधार नहीं चाहता, तो उसकी कठिनाईयां कभी खत्म नहीं होंगी।
पाठ पर दृश्य-विवेचन (नीतिवचन 26:11, HINIRV)
“जैसे कुत्ता अपनी छाँट को चाटता है, वैसे ही मूर्ख अपनी मूर्खता को दोहराता है।” इस वाक्य में सन्निकट और सरल भाषा में एक दृश्यमान सच दिया गया है: मूर्खता को बार-बार दोहराने वाला व्यक्ति अपने ही अज्ञान से जाल में फँसे रहता है। नीतिवचन के संदर्भ में यह सीख सीधे-सीधे चरित्र-निर्माण और व्यवहार-परिवर्तन को उद्धृत करती है—जब तक मनुष्य अपनी त्रुटि स्वीकार नहीं करता और परिवर्तन की इच्छा नहीं रखता, तब तक सुधार संभव नहीं।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
इस आयत का केंद्रीय संदेश है: आत्म-भरोसा नहीं, बल्कि विवेक की ग्रहणशीलता। मूर्खता का जहर तब तक असर नहीं छोड़ता जब तक विश्वास, विवेक और नैतिकता की दिशा में कदम नहीं बढ़ता। यह सच लगभग सभी पवित्र शास्त्रों के अनुसार है—ज्ञान के पीछे प्रेम और नम्रता की इच्छा हो तो व्यवहार बदलता है; अन्यथा भ्रम और दोहराव जन्म लेते हैं।
संबंधित पाठ के नमूने (क्रॉस-रेफरेंस) और उनका संक्षिप्त संबंध
इन क्रॉस-रेफरेंसेज में एक समान धुन है: ज्ञान के साथ आचरण आवश्यक है; वरना बहकाव और बार-बार की भूलें ही परिणाम बनते हैं।
जीवन-आचार में अनुप्रयोग
पूर्वधारणा-समर्थन (कलात्मक उद्धरण की समीक्षा)
यह पंक्ति, जैसी अन्य भाषाओं में भी, मूर्खता के प्रति स्पष्ट चेतावनी देता है। इस विषय पर पुरानी विभूति-वाले टीका-लेखकों के विचारों में भी, उदाहरण के रूप में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke आदि ने कहा है कि परिवर्तन की इच्छा न हो, तो ज्ञान भी केवल सुने रहने तक सीमित रहता है। अगर आप चाहें तो मैं इन पंक्तियों के छोटे उद्धरण हिंदी में दे सकता हूँ, परन्तु यहाँ हमने सादगी बनाए रखी है ताकि पाठ सीधे सीख दे।
संक्षेप
नीतिवचन 26:11 की यह उपमा सरल पर गहरी है: बार-बार अपनी गलतियों पर अडिग रहने से न बढ़ोतरी है, न सुधार। सत्य की राह पर चलना, उसे मानना और व्यवहार में लाना—यही बुद्धिमानी है। इस पाठ में आत्म-निग्रह और परिवर्तन की आवश्यकता स्पष्ट रूप से उभरती है, और यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पहले था।
क्रॉस-रेफरेंसेज के संदर्भ में देखें: नीतिवचन 14:8; 2 पतरस 2:20-22; याकूब 1:22।
नोट: इस पाठ के साथ Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के मूल टिप्पणियाँ से कोई संपूर्ण उद्धरण वहां नहीं दिए गए हैं, पर उनके सामान्य विचार इस प्रस्तुति में संरचनात्मक रूप से समाहित हैं।