Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31



नीतिवचन 5:10 का पाठ—अनुचित लाभ पर विचार
पद का संदेश एक चेतावनी है कि अनैतिक कमाई या दूसरों के द्वारा प्राप्त धन से जीवन के लाभ उठाने से वास्तविक करुणा और स्थिरता नहीं मिलती है। यहाँ प्रस्तुत छवि यह है कि पराए खानापानी, परदेशी हृदय और दूसरों के श्रम के फल-सब कुछ एक दिन हमारे अपने घर से दूर बने रहते हैं। यह एक व्यावहारिक धार्मिक पाठ है जो हमारे विचारों, निवेशों और नैतिक चुनावों को ठोस रूप में प्रकट करता है।
पृष्ठभूमि में अध्याय से संदर्भ
नीतिवचन का यह भाग व्यवहारिक चित्त-वृत्ति पर केन्द्रित है—कैसे व्यक्ति के हित और परमेश्वर की व्यवस्था एक-दूसरे के साथ जुड़ते हैं। इस verse में शास्त्री कहते हैं कि अगर कोई अप्रत्यक्ष या अधर्मसंपदा से जीवन-उपार्जन करता है, तो उसका लाभ अन्ततः नहीं टिक पाता; अन्यथा, जो अपनी ही मेहनत और ईमानदार धरोहर से जीवन-आनंद पाता है, वही स्थिर खुशहाली अनुभव करता है।
मुख्य आध्यात्मिक शिक्षा
कुल मिलाकर यह पाठ दो विचारों को उभारता है: एक, नैतिक पथ से प्राप्त धन और खुशहाली अधिक टिकाऊ है; दो, दूसरों के परिश्रम से प्राप्त लाभ का दुरुपयोग नैतिक गिरावट और आत्मिक नुकसान का कारण बनता है। यहां आत्म-संयम, ईमानदारी और परमेश्वर के वितरण के प्रति भरोसा प्रमुख केंद्र बनते हैं।
अन्य पवित्र ग्रन्थ से सम्बद्ध संदर्भ
उद्धृत संदर्भों के विचार में, अध्याय 5 तथा अन्य स्थानों में धन-लाभ के नैतिक आयाम स्पष्ट होते हैं—जिनका लक्ष्य ईश्वर की महिमा और परिवार-समुदाय की सुरक्षा है, न कि स्वार्थ-लाभ।
हमें कैसे अपनाना चाहिए
संक्षेप
नीतिवचन 5:10 हमें याद दिलाता है कि धन-संपत्ति का वास्तविक मूल्य वहाँ निहित नहीं है जहाँ हम दूसरों के बल का लाभ उठाकर कुछ जुटाते हैं, बल्कि उस मार्ग पर है जिसमें ईमानदारी, नैतिक आचार और परमेश्वर की योजना के अनुरूप जीवन जीया जाता है। जो अपनी मेहनत से सचेत रहते हैं, वे न केवल परमेश्वर के आशीर्वाद की स्थिरता देखते हैं, बल्कि उनके परिवार और समुदाय में भी स्थायित्व आता है।
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षेप)
1) स्रोत की पवित्रता बनाये रखना: धन की प्राप्ति का मार्ग पवित्र होना चाहिए, ताकि लाभ भी आशीर्वाद बनकर लौटे।
2) ईमानदारी का फल: परिश्रम से मिला धन परिवार और समुदाय के लिए सुरक्षा बन सकता है।
3) देव-विश्वास में धन का स्थान: धन एक साधन है, प्रभु के उद्देश्य के लिए समर्पित किया जाए ताकि जीविका और करुणा दोनों विकसित हों।
ऊपर के विचार Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के टिप्पणीयों के संक्षिप्त अर्थों के अनुरूप समन्वयित हैं।