Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31



नीतिवचन 5:18 का आध्यात्मिक सार: अपने जीवन के स्रोत से आनंद बनाये रखें
मुख्य व्याख्यात्मक बिंदु: बान्हे हुए विवाह के तत्व के भीतर परमेश्वर की दी हुई आशीष वह है जिसे आदमी अपनाकर अपने संसर्ग और प्रेम को सार्थक बनाता है। तेरा सोता धन्य रहे; और अपनी जवानी की पत्नी के साथ आनन्दित रह—यह विवेकपूर्वक ईश्वर के बनाए हुए प्रेम-बंधन की वास्तविकताओं को दर्शाते हैं। यह वचन जीवन के संयम, वफादारी और मौलिक घर-परिवार की स्थायित्व की दिशा में प्रेरित करता है।
पाठ के साहित्यिक परिप्रेक्ष्य
नीतिवचन 5 में पति के लिए विवाह-निष्ठा की महत्ता बारम्बार उभार दी जाती है। यहाँ संघर्षों से बचते हुए पति-पत्नी के बीच आपसी आनंद की दृष्टि है, जो व्यक्ति को विनम्रता और ईमानदारी के साथ अपनी जिम्मेदारियों के पालन की प्रेरणा देती है। “अपनी जवानी की पत्नी” शब्द उन संबंध-विश्वासों की पुष्टि करते हैं जो हृदय में स्थिर रहें और घर के वातावरण को प्रसन्न बनाए रखें।
धर्मशास्त्रीय महत्व
यह आयत विवाह के पवित्र प्रेम की सराहना करती है—जो एकरेखा के भीतर अनुभव किया जाना चाहिए, न की बाहरी दिखावे में। संतुलित जीवन, एक दूसरे के प्रति सम्मान, और ईश्वर के नियोजन में एक दूसरे के साथ समय बिताना—ये सब इस पाठ की पवित्र मांगें हैं। यह संकेत देता है कि धन-संपत्ति की-तरक्की के साथ भी, विवाह-संबंध की विशिष्ट महत्ता बनी रहती है।
पवित्रशास्त्र से सम्बन्ध
1) सृष्टि के प्रारम्भ से विवाह एक संस्थान के रूप में उद्धृत है, जहाँ पति-पत्नी एक दूसरे के साथ जीवन-यापन करते हैं (उत्पत्ति 2:24) - यह यहीं प्रतिध्वनित होता है कि एक परिवार की खुशी ईश्वर की कृपा से आती है।
2) प्रेम, निष्ठा और काम-स्वामित्व के प्रति प्रेरणा के संदर्भ में इसलिए भी मजबूत है क्योंकि फिर भी कई संदेशकत्ति के कारण विवाह में आशीष बनाए रखना आवश्यक है।
3) अनुशासन और यथार्थ-जीवन का संतुलन—यह आयत जीवन की सुख-समृद्धि के लिए ईश्वर की योजना का भाग है, न कि केवल व्यक्तिगत आनंद का साधन।
धर्म-जीवन के लिए प्रश्न
- क्या मैं अपनी पत्नी के साथ समय बिताने और उसे सम्मान देने के लिए अपने दिनचर्या का संतुलन बना रहा हूँ?
- क्या मेरा धन, मेहनत और सफलता सीधे-सीधे पारिवारिक सुख में योगदान करते हैं, या वे संबंधों पर दबाव बनाते हैं?
- क्या मैं विवाह-बंधन को प्रेम, विश्वास और आशीष के साथ बनाए रखने हेतु नियमित प्रार्थना करता/ करती हूँ?
अन्विती भाष्य—चर्चित टिप्पणी से समेकित अंतर्दृष्टि
Matthew Henry ने यह दर्शाया है कि विवाह में प्रियतम के प्रति भरोसा और शोहरतें केवल बाहरी सुख नहीं, बल्कि आत्मा की शांति का स्रोत हैं। Albert Barnes ने इसे यह माना कि पति की जवानी की पत्नी के प्रति आनंद एक दीर्घकालीन वफादारी का परिणाम है, जो परिवार को ईश्वर के प्रेम का संकेत देती है। Adam Clarke ने इस आयत को सम्मिलित किया है कि विवाह-बंधन में लगाव और प्रगाढ़ता जीवन के अन्य क्षेत्रों की अनुशासनिक प्रेरणा बनती है। इन तीनों टिप्पणीकारों के मिलजुल विचार से स्पष्ट होता है कि विवाह-जीवन की प्राथमिकता में प्रेम, समर्पण और नैतिकता का संगम सच्ची खुशी का आधार है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
नीतिवचन 5:18 हमें याद दिलाता है कि जीवन-सुख का परम स्रोत हमारे घर-परिवार के भीतर है। अपनी जवानी की पत्नी के साथ प्रेम और सम्मान बनाकर चलना, धन के साथ भी, ईश्वर की नियत के अनुसार जीवन का सबसे प्रबल आशीर्वाद है।
क्रॉस-रेफरेंसेस
- उत्पत्ति 2:24: विवाह के संस्थान की शुरुआत और पति-पत्नी की एकता।
- मलाकी 2:14-16: विवाह के प्रति जीवंत प्रतिबद्धता और ईश्वर के साथ तुलना में पत्नीयों के प्रति सम्मान की चर्चा।
- इफिसियों 5:25-33: Christ के प्रेम के उदाहरण के साथ पति-पत्नी के रिश्ते की निष्ठा और त्याग।