भजन संहिता 115:7 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

उनके हाथ तो रहते हैं, परन्तु वे स्पर्श नहीं कर सकती; उनके पाँव तो रहते हैं, परन्तु वे चल नहीं सकती; और उनके कण्ठ से कुछ भी शब्द नहीं निकाल सकती। (भज. 135:16-17)

भजन संहिता 115:7 पद-दर-पद बाइबल टीका

भजन संहिता 115:7 पर प्रकाश: उनके हाथ रहते हैं, परन्तु वे स्पर्श नहीं कर सकती

पद का पृष्ठभूमि और तत्काल संदर्भ में: यह पद मृत्यु के देवताओं और मूर्तिपूजा के निष्ठुरता को उजागर करता है। भजनकार परमेश्वर के विरुद्ध मूर्तियों की निरर्थकता को दर्शाते हैं—वे आकार में भिन्न, परंतु गतिहीन हैं। यह स्वीकारोक्ति उठाती है कि मानव समुदाय ने पत्थर, लोहे या लकड़ी को पिनार्की के रूप में स्थापित किया, पर वे जीवित आत्मीय संपर्क या सहायता नहीं दे सकतीं। भजन संहिता 115:7 एक तरह से उन मूर्तियों के भीतर क्रिया-जीव की कमी को उजागर करता है: हाथों से छूना संभव नहीं, पाँवों से चलना असंभव—यह सारी दृश्यता कुछ भी नहीं दिखाती जब जीवन-सम्पर्क की बात हो। उसी प्रकार यह ईश्वरीय निष्ठा की वास्तविकता बनाम निर्गत-निर्विघ्नताओं के बीच स्पष्ट अंतर करता है।

यह पाठ क्या दिखाता है—ईश्वर और विश्वास के बारे में

इस आयत में भगवान के विरुद्ध मूर्ति-पूजा की असंगति स्पष्ट है: मूर्तियाँ शरीर-रूपी हैं, पर वे जीवित, ग्रहणशील और मदद-करने योग्य नहीं हैं। जो देवता मनुष्यों के लिए जीवन-उत्साह और सुरक्षा का स्रोत बन सकता है, वही मूर्ति केवल बाहरी दिखावा है। यह बताता है कि ईश्वर अपने भक्तों के साथ सचेत, क्रियाशील और प्रेमपूर्ण रूप से जुड़ा रहता है—हमारी दुआएँ, हमारी आस्था और हमारी जीवन-चर्या में।

शब्दों और छवियों की स्पष्टता

- हाथ, जो स्पर्श कर सकें, उसका अभाव दिखाता है कि मूर्तियाँ परस्पर संपर्क या सहायता नहीं दे सकतीं।
- पाँव, जो चल सकें, पर मूर्तियाँ चल नहीं सकतीं; यहाँ गतिशीलता और क्रिया में अंतर है।
- कण्ठ से शब्द—आवाज़ और कार्य-प्रेरणा नहीं; मूर्ति बोल नहीं सकती।

इन सबमें पाठक यह सोचने पर विवश होता है कि जो जी उठे, वह केवल परमेश्वर हो सकता है, जो प्रत्यक्ष प्रेम और सहायता दे।

अन्य संदर्भ और पाठ-जोड़े

1) भज 135:16-17— मूर्तियाँ न तो आँखों से देखते हैं, न कानों से सुनते; यह पाठ एक समान चेतावनी देता है कि मूर्तियाँ निर्जीव हैं।
2) निर्जीवता बनाम जीवित神: बाइबल के अन्य हिस्सों में ईश्वर को “जो सुनता-चुनता है” के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो भक्तों की पुकार सुनता है और उनके बीच आता है।
3) उद्धार में विश्वास की साधना: विश्वासियों के लिए प्रेरणा है कि वे मूर्तिपूजा के बजाय जीवित परमेश्वर के साथ वास्तविक संबंध बनाए रखें।

पद्य से सीख—आज के लिए zastos

- परमेश्वर की जीवितता पर भरोसा रखें: वह हमारे रोय-रौब, हमारी दुआओं और हमारी ज़िंदगियों में सक्रिय है।
- मूर्तिपूजा से सावधान रहें: यह पाठ साहस देता है कि हम प्रतिष्ठान, चिह्नों या रुचियों से परे जाकर परमेश्वर के वास्तविक प्रेम और सहायता की खोज करें।
- जीवन-क्रिया में आस्था दिखाएं: केवल बातें नहीं, बल्कि व्यवहार, मदद और समुदाय में प्रेरणा दें।

आख़िरकार, यह आयत हमें स्मरण कराती है कि भक्ति का सच परमेश्वर के साथ सचेत और सक्रिय संबंध है—जो बोल सकता, चल सकता और दयालु सहायता दे सकता है, न कि निर्जीव ढांचे के द्वारा।

उद्धृत अनुभाग—सारणी प्रमाणित विचार

ः Matthew Henry से एक सामान्य विचार: मूर्तियों का प्राणहीन होना उनके पूजनीय होने के बावजूद उनकी प्रभावशीलता को सीमित कर देता है; वास्तविकता में परमेश्वर ही वह है जिसे मार्गदर्शक के रूप में पथ-प्रदर्शन चाहिए।

ः Albert Barnes से एक संकल्पना: मूर्तिपूजा से बचना चाहिए क्योंकि मानव की कृपा और सहायता केवल जीवित परमेश्वर से ही संभव है।

ः Adam Clarke से एक स्मरण: मूर्तियाँ स्वयं कुछ नहीं करतीं, क्योंकि वे बनावट के बाद स्थिर हैं; प्रभु ही वह है जो जीवित गवाही देता है और सहायता पहुँचाता है।

नोट: नीचे उद्धरण पूर्ण पाठ नहीं हैं; वे केवल विचार-आधार के लिए संदर्भित हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

भजन संहिता 115:7 समानांतर पद और संबंधित वचन

इस बाइबल अंश से संबंधित समानांतर वचन चित्र अभी उपलब्ध नहीं हैं।

HINIRV बाइबल की पुस्तक चुनें