भजन संहिता 59:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

वे टुकड़े के लिये मारे-मारे फिरते, और तृप्त न होने पर रात भर गुर्राते है।

भजन संहिता 59:15 पद-दर-पद बाइबल टीका

भजन संहिता 59:15 का स्पष्ट व्याख्या

पद 59 में अभिभावक राजा David उन लोगों की हालत का चित्रण करते हैं जो शत्रुओं के भय से थमे नहीं रहते हैं और निरंतर उत्पात मचाते हैं। यहाँ “टुकड़े के लिये मारे-मारे फिरते” से आशय है कि वे भोजन या प्रेम, सुरक्षा की तलाश में भटकते रहते हैं, पर उन्हें तृप्ति नहीं मिलती। रात भर गुर्राने का भाव उनके उग्र, चुगुल, और निरंशुक स्वभाव को दर्शाता है—वे शांत नहीं होते, बल्कि भय, क्रोध और हृदयघाती स्वभाव से भर रहते हैं। इस पंक्ति में परमेश्वर के प्रति भरोसे की कमी और मानव वृत्ति की असंतुष्टि उभर कर सामने आती है।

मुख्य अर्थ

यह पद दिखाता है कि शत्रुओं की प्रवृत्ति कितनी असंतुष्ट और चिरवृत्त है। उनके आंतरिक भय और बेचैनी उन्हें रात भर प्रेरित करती है; वे आराम नहीं पाते, क्योंकि उनका उद्देश्य दूसरों को दुख पहुँचाना या अपने भीतर की रिक्तता को भरना है। यह भी संकेत है कि दुष्टता के कटु परिणाम अकेले नहीं रहते—वे अक्सर अपनी ही अस्थिरता और बुराई में घिर जाते हैं।

कुंजी विषय

  • निरंतर असंतुष्टि: दुख और भय से ग्रस्त कर्म।
  • आंतरिक अविश्वास: परमेश्वर से दूर रहने पर मानव आत्मा अशांत रहती है।
  • न्याय और व्यवस्था: अन्याय पर भी अंततः परिणाम होते हैं, भले अभी दिखाई न दें।

संबद्ध अनुभाग और उनके संकेत

यह विचार पंक्तियों में “बेतरतीब भटकना” और “रात भर गुर्राना” जैसी छवियों से समर्थ होता है। तुलना के लिए देखें: भजन 22:13-14 जिसमें दुश्मनों की घबराहट और भय का दृश्य मिलता है; भजन 37:1-2 जहाँ शापित जीवन की अस्थिरता और तात्कालिक चित्त-उथल-पुथल सामने आती है; और यिर्मयाह 2:12-13 में आत्म-निर्भरता के परिणामस्वरूप भटकना स्पष्ट होता है।

प practically विचार

हम कैसे समझें कि असंतुष्टि और तड़प मानवीय जीवन के किस हिस्से को ढंकते हैं? यह चोट तब साफ दिखती है जब हम देखते हैं कि भय, क्रोध और घबराहट से संचालित किसी भी कदम से जीवन की शांति टूटती है। वर्तमान परिस्थितियों में भी—चाहे परिस्थिति कैसी भी हो—परमेश्वर के बारे में विश्वास बनाए रखना संतुष्टि की कुंजी है। वास्तविक सुरक्षा वही देता है जोसीदा-विश्वास से आता है।

क्रॉस-रेफरेंस (संक्षिप्त सार सहित)

1) भजन 22:13-14: दुश्मनों की घबराहट और आंतरिक भय का चित्रण। यह दिखाता है कि विपत्ति के समय भी आत्मा कैसे आर्त हो उठती है।

2) भजन 37:1-2: असंतोषपूर्ण वृत्ति के कारण होने वाले क्षणिक क्रोध और रीढ़हीनता पर संकेत।

3) यिर्मयाह 2:12-13: आत्म-निर्भरता से उत्पन्न उद्विग्नता और आत्मा की रिक्तता का चित्रण।

संक्षिप्त शास्त्रीय विवेचन (उद्धृत विचारों का संकलन)

Matthew Henry ने दिखाया है कि दुष्ट जीवन की असंतुष्टि उसे निरंतर उत्पात करने के लिए प्रेरित करती है, क्योंकि उसकी आत्मा परमेश्वर की शांति से वंचित रहती है। Albert Barnes ने कहा कि यहाँ का दृश्य न केवल बाह्य आतंक है, बल्कि भीतर के भय और नीतिगत अधूरापन का परिणाम है। Adam Clarke ने व्याख्या की है कि ये टुकड़े-टुकड़े लोगों की मानसिक असंतुष्टि और जीवन के उद्देश्यों की कमी का परिणाम है; वे दया और न्याय दोनों के योग्य नहीं होते।

संक्षिप्त समापन

यह पद हमें संकल्पित करता है कि जब हम भय, क्रोध और असंतोष से भर जाएँ, तब भी प्रभु के प्रति भरोसा बनाए रखें। असंतुष्ट जीवन अपने आप को ही खो देता है; पर परमेश्वर के प्रकाश में संतोष व शांति मिलती है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

भजन संहिता 59:15 समानांतर पद और संबंधित वचन

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