Old Testament
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रोमियों 6:16 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्या तुम नहीं जानते कि जिसकी आज्ञा मानने के लिये तुम अपने आप को दासों के समान सौंप देते हो उसी के दास हो: चाहे पाप के, जिसका अन्त मृत्यु है, चाहे आज्ञा मानने के, जिसका अन्त धार्मिकता है?
रोमियों 6:16 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
रोमियों 6:16 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यहोशू 24:15 (HINIRV) »
और यदि यहोवा की सेवा करनी तुम्हें बुरी लगे, तो आज चुन लो* कि तुम किस की सेवा करोगे, चाहे उन देवताओं की जिनकी सेवा तुम्हारे पुरखा महानद के उस पार करते थे, और चाहे एमोरियों के देवताओं की सेवा करो जिनके देश में तुम रहते हो; परन्तु मैं तो अपने घराने समेत यहोवा ही की सेवा नित करूँगा।”

यूहन्ना 8:34 (HINIRV) »
यीशु ने उनको उत्तर दिया, “मैं तुम से सच-सच कहता हूँ कि जो कोई पाप करता है, वह पाप का दास है।

2 पतरस 2:19 (HINIRV) »
वे उन्हें स्वतंत्र होने की प्रतिज्ञा तो देते हैं, पर आप ही सड़ाहट के दास हैं, क्योंकि जो व्यक्ति जिससे हार गया है, वह उसका दास बन जाता है।
रोमियों 6:16 — तुझे कौन सा दास बनाता है, वह पहचान
यह वचन उन लोगों के लिए मौलिक चेतावनी बनकर आता है जो पाप के रस में डूबे रहते हैं। Apostle पॉल का संदेश स्पष्ट है: आप किसी के दास बन जाएँ, यह निश्चय कर लेते हैं कि आप किस दिशा में चलेंगे—क्या आप पाप के दास बनेंगे या परमेश्वर की वंदना-सत्य के दास? वह कहते हैं कि आप अपने आप को जिनके अहंकार और स्वार्थ के अधीन मानते हैं, वे आपके दास बन जाते हैं; और परिणामस्वरूप, जिनके दास बनते हैं, उनके अंत भी वही होंगे जो उनके दास बनाते हैं।
प्रथम संदर्भ और मूलार्थ
पॉल इस पंक्ति के माध्यम से यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि नया जीवन तब शुरू होता है जब हम अपनी स्व-स्वीकृति को त्यागकर किसी के अनुशासन के भीतर आ जाते हैं। आप चाहे पाप के अधीन रहें—जिसका परिणाम मरण है—या धार्मिकता के मार्ग की आज्ञाओं के अधीन हों—जिसका परिणाम जीवन और धार्मिकता है—आपकी चाबुक वही बनती है जिसके सामने आप स्वतः-अनुशासन स्वीकारते हैं।
मुख्य संदेश
संघर्ष और अनुप्रयोग
जो व्यक्ति पाप के दास बनते हैं, वे अपनी आत्मा-जीवन में भी दासत्व के बाँध ढीले नहीं कर पाते। क्रोध, अभिमान, चोरी या पाखंड—ये सभी पाप के दासत्व के लक्षण होते हैं। जबकि परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुरूप चलना, सत्य के अनुसार व्यवहार करना, दिल को नयी क़ीमत देता है—जो आत्मा को स्थिर और शुद्ध बनाता है।
क्रॉस-रेफरेंस और उनसे मिलने वाले उजागर विचार
1) रोमियों 6:12-13 — पाप को शरीर पर हावी न होने देना, और ईश्वर की महामिमाओं के अनुसार अपने प्रतिनिधित्व को प्रस्तुत करना। यह संदेश बताता है कि व्यवहार ही हमारे दासत्व का संकेत होते हैं।
2) रोमियों 8:12-14 — आत्मा के निर्देश के अनुसार चलना; आत्मिक जीवन के लिए ईश्वर की पुत्र-आत्मा का नेतृत्व आवश्यक है।
3) गलातियों 5:16-25 — आत्मा-फलों के अनुसार चलना और वासना के फलों से दूर रहना; यह स्पष्ट करता है कि किस दासत्व का चयन जीवन के लिए लाभदायक है।
पृथक विचार: किन उद्धरणों से मार्गदर्शन मिलता है
यह पंक्ति Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke जैसे प्रसिद्ध पवित्र-पत्र टिप्पणियों के अनुरूप एक ही धारा को पुष्ट करती है: जीवन के लिए सही दासत्व का चयन ईश्वर-आज्ञाओं के पक्ष में होना चाहिए; पाप के बंधन जीवन-सम्मत नहीं, बल्कि नष्टकारी है।
व्यावहारिक अनुशासन और व्यक्तिगत प्रतिबिंब
1) अपने दैनिक निर्णयों में यह प्रश्न रखें: क्या यह कदम मुझे परमेश्वर के सामने दास बनाता है या पाप के मार्ग पर? 2) कठिन परिस्थितियों में भी सत्य-आज्ञा के अनुसार व्यवहार बनाये रखना। 3) प्रार्थना में यह माँगना कि आत्मा के निर्देश से मार्गदर्शन मिले, ताकि दासत्व का मार्ग धार्मिकता की ओर मोड़ा जा सके।
संक्षिप्त devotional reflection
हम हर दिन छोटे-छोटे चुनाव करते हैं—किस पक्ष में दास बनना है। यदि हम पाप के दास बनते हैं, अंत में टूटन और मृत्यु है; पर यदि हम परमेश्वर के आदेशों के दास बनें, तो जीवन, शांति और धार्मिकता का मार्ग खुलता है। यह_choice आपको देह के प्रवाह से नहीं, आत्मा के निर्देश से चलती है।
याद रखें: जहां हमारा दिल जाता है, वहीं हमारा दास बनना तय होता है। तो मन को यीशु की पथप्रशस्ति में शरण दें, ताकि नया जीवन हरकत में आ सके।
महत्वपूर्ण उद्धरण (मईथ्यू हेन्री, अल्बर्ट बार्न्स, एडम क्लार्क से यदि उपलब्ध हों): कभी-कभी इन टिप्पणीकारों के विचार सीधे शब्दों में नहीं मिलते, पर उनके मान्य सिद्धांत इस दार्शनिक धारा के साथ संगत रहते हैं कि जीवन का दासत्व या स्वतंत्रता चयन-प्रधान है—पाप के दासत्व को त्याग देना और ईश्वर-धर्म के दासत्व को अपनाना जीवन का मार्ग है।