Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीसपन्याह 3:2 बाइबल पद की व्याख्या
सपन्याह 3:2 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
उसने मेरी नहीं सुनी, उसने ताड़ना से भी नहीं माना, उसने यहोवा पर भरोसा नहीं रखा*, वह अपने परमेश्वर के समीप नहीं आई।
सपन्याह 3:2 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
सपन्याह 3:2 समानांतर पद और संबंधित वचन
उन बाइबल पदों को देखें जो विषय, शिक्षा या संदर्भ के आधार पर इस अंश से जुड़े हैं। समानांतर पदों की तुलना करने से इस वचन के संदर्भ और संदेश को अधिक गहराई से समझने में सहायता मिलती है। किसी चित्र को चुनें और संबंधित पद, उसकी व्याख्या तथा पद-दर-पद बाइबल टीका देखें।

यिर्मयाह 22:21 (HINIRV) »
तेरे सुख के समय मैंने तुझको चिताया था, परन्तु तूने कहा, 'मैं तेरी न सुनूँगी।' युवावस्था ही से तेरी चाल ऐसी है कि तू मेरी बात नहीं सुनती।

यिर्मयाह 5:3 (HINIRV) »
हे यहोवा, क्या तेरी दृष्टि सच्चाई पर नहीं है?* तूने उनको दुःख दिया, परन्तु वे शोकित नहीं हुए; तूने उनको नाश किया, परन्तु उन्होंने ताड़ना से भी नहीं माना। उन्होंने अपना मन चट्टान से भी अधिक कठोर किया है; उन्होंने पश्चाताप करने से इन्कार किया है।

यिर्मयाह 7:23 (HINIRV) »
परन्तु मैंने तो उनको यह आज्ञा दी कि मेरे वचन को मानो*, तब मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँगा, और तुम मेरी प्रजा ठहरोगे; और जिस मार्ग की मैं तुम्हें आज्ञा दूँ उसी में चलो, तब तुम्हारा भला होगा।
प्रासंगिक परिवेश
सपन्याह (सपनीयाह) 3:2 छोटे, लेकिन तीव्र शब्दों में यरूशलेम की आत्मिक अवस्था बयान करता है। यह नबी सन्देश के उस हिस्से का अंग है जहाँ परमेश्वर नगर की बुराइयों, नेताओं की भ्रष्टि और जनमानस की अवज्ञा की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। यह वचन इससे पहले आयतों में वर्णित न्याय के अभाव, झूठे संतों और दीन-दुखियों पर अत्याचार की पृष्ठभूमि में समझा जाना चाहिए। कुल मिलाकर यह प्रश्न उठाता है कि जब नेतृत्व और जनता तभी राज पर नहीं टिकते — तब परमेश्वर के साथ संबंध कैसे बना रहे।
वचन से परमेश्वर तथा विश्वास के बारे में क्या प्रकट होता है
आयत कहती है कि "उसने मेरी नहीं सुनी, उसने ताड़ना से भी नहीं माना, उसने यहोवा पर भरोसा नहीं रखा, वह अपने परमेश्वर के समीप नहीं आई।" यह त्रि‑आयामी निष्कर्ष है: अवज्ञा, अनुत्तरित ताड़ना, और भरोसे की अनुपस्थिति। इससे स्पष्ट होता है कि परमेश्वर न केवल कानून और उपदेश के स्रोत हैं, बल्कि सहानुभूति से मोड़कर प्रेरित कर रहे हैं—उनकी ताड़ना का उद्देश्य सुधार है। जब लोग सुनने और मन बदलने से इंकार करते हैं, तो उनका परमेश्वर के साथ संबंध टूट जाता है। यहाँ परमेश्वर का स्वर दंडकथ्यक नहीं मात्र, परन्तु सम्बन्ध की पुकार है।
प्रमुख शब्द और चित्रों की व्याख्या
"नहीं सुनी"—यह सामान्य अस्वीकृति का संकेत है, न केवल शोर में न सुनना, बल्कि आन्तरिक मन से परमेश्वर के सम्बोधनों का अस्वीकार करना। "ताड़ना"—नबी द्वारा चेतावनी और सुधार के प्रयत्न; इससे यह स्पष्ट होता है कि नबी‑संदेश पहले पहुँच चुका था परन्तु फल नहीं दिया। "भरोसा नहीं रखा"—भरोसा केवल बौद्धिक स्वीकृति नहीं, बल्कि निर्भरता व आत्मसमर्पण है। "अपने परमेश्वर के समीप नहीं आई"—वह दूरी केवल भौतिक नहीं, आत्मिक और धार्मिक अलगाव का चित्र है।
संबंधित पद और उनके संबंध की संक्षिप्त व्याख्या
प्रस्तुत‑कालीन व्यावहारिक अनुप्रयोग
यह वचन आज के पाठकों के लिए अभी भी प्रासंगिक है: आध्यात्मिक सुनवाई और विश्वास का अभाव व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर विभाजन और कमजोरियों को जन्म देता है। व्यक्तिगत रूप में प्रश्न उठता है—क्या हम सुनते हैं जब परमेश्वर हमें सुधरने का आह्वान करता है? क्या हम चेतावनियों से सीखते हैं या अनदेखा कर देते हैं? सामुदायिक स्तर पर यह नेता और जनता दोनों को सत्य-आधारित जीवन के लिए जवाबदेह ठहराता है।
सारांश और समेकित विचार
सपन्याह 3:2 सुस्पष्ट निर्देश देता है कि धार्मिक दिखावे के बावजूद यदि हृदय अविश्वास और अवज्ञा में है तो परमेश्वर के साथ सच्चा संबंध नहीं बनता। नबी की ताड़ना सुधार का निमंत्रण है, न केवल दण्ड का घोर प्रसंग। प्राचीन संदर्भ में यह शब्द न्याय और पूजा की वास्तविकता पर प्रश्न उठाते हैं; आज के संदर्भ में यह व्यक्तिगत आत्म‑जांच, समुदायिक जवाबदेही और प्रभु की ओर सचेत लौटने की पुकार है।
प्रासंगिक उद्धरणों का संक्षिप्त संकेत
मैथ्यू हेनरी परंपरा में सामान्यतः यह तर्क मिलता है कि परमेश्वर की निंदा का उद्देश्य सुधार है; अल्बर्ट बार्न्स भी अक्सर "ताड़ना" और "सुनने" के व्यवहारिक अर्थों पर जोर देते हैं। (यहाँ पूर्ण अनुच्छेद उद्धरण नहीं दिए गए।)