Old Testament
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1 कुरिन्थियों 13:13 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
पर अब विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों स्थायी* है, पर इनमें सबसे बड़ा प्रेम है।
1 कुरिन्थियों 13:13 पद-दर-पद बाइबल टीका
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1 कुरिन्थियों 13:13 समानांतर पद और संबंधित वचन
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1 कुरिन्थियों 13:1 (HINIRV) »
यदि मैं मनुष्यों, और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलूँ, और प्रेम न रखूँ, तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल, और झंझनाती हुई झाँझ हूँ।


1 कुरिन्थियों 13:13 का संक्षिप्त परिचय
इस पवित्र उपदेश में प्रेरित पतरसियों के पत्र के भीतर पौलुस प्रेम की सर्वोच्चता को केंद्र में रखते हैं। 13 अध्याय में प्रेम के सचेत, निःस्वार्थ प्रदर्शन की बात है; इसका लक्ष्य स्वयं के स्वार्थ से ऊपर उठ कर निष्ठा और अनुशासन के साथ जीवन जीना है। यहाँ तीन महत्त्वपूर्ण चीजें—विश्वास, आशा और प्रेम—के स्थायित्व पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें प्रेम सबसे ऊपर माना गया है।
पंचकड़ी पाठ का प्रत्येक अनुभाग संदर्भ
पूरे अध्याय में प्रेम को व्यवहारिक, क्रियात्मक और दैवीय प्रभाव के रूप में चित्रित किया गया है। verses 1–3 में प्रेम के बिना कर्म क्या होते हैं, यह दिखाया गया है; 4–7 में प्रेम की धातु क्या होनी चाहिए, इसका नैतिक ढांचा दिया गया है; अंत में 8–13 में प्रेम के अनंत स्थायित्व और चिरस्थायित्व की आशा को स्थापित किया गया है। 13:13 में विशेषतः विश्वास, आशा, प्रेम—इन तीनों में प्रेम ही सर्वोচ্চ दर्जा पाता है।
मुख्य अध्यायगत पाठ और इस verses का संदेश
पॉल का संदेश स्पष्ट है: विश्वास, आशा और प्रेम तीनों स्थायी हैं, पर प्रेम ही अमरता की चरम सीमा है। विश्वास हमें दुख-संयम और ईश्वर के वचन पर हमारी निर्भरता दिखाता है; आशा हमें भविष्य की प्रतिज्ञाओं में स्थिर बनाये रखती है; पर प्रेम वह शक्ति है जो इन दोनों के क्रियान्वयन को व्यवहारिक बनाती है। प्रेम बिना किसी स्वार्थ के होता है, और यही वह दिव्य गुण है जो सब गुणों को गति देता है।
वानी तुलना और संदर्भ
इस विचार को अन्य बाइबल पाठों में भी देखा जा सकता है: याकूब 1:22–25 में क्रियान्वयन की महत्ता पर जोर है; 1 यूहन्ना 3:16–18 प्रेम का व्यवहारिक उल्लंघन-निवारण दिखाते हैं; 48:10 में ईश्वर ही प्रेम है—जो इसे आधार बनाता है। इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि विश्वास और आशा प्रेम के बिना पूर्ण नहीं होते और प्रेम उन दोनों को सही दिशा में चलाने वाला मार्गदर्शक है।
व्यावहारिक आवेदन
ध्यान दें कि यहाँ प्रेम का प्रयोजन आत्म-उच्चाटन नहीं, बल्कि ईश्वर के साथ और दूसरों के साथ एक सच्चे रिश्ते की व्याख्या है। प्रेम की यह स्थिरता जीवन की सभी कठिनाइयों में एक स्थिर दायरा बनाती है।
क्रॉस-रेफरेंसेस के साथ छोटी तुलना
- रोम 8:28–30: प्रेमपूर्ण कार्यों के मार्ग में उद्धार की योजना—विश्वास और आशा के साथ प्रेम की क्रिया।
- याकूब 2:14–26: विश्वास के साथ कर्म का संगम—प्रेम ही वह शक्ति है जो शब्दों को व्यवहार बनाती है।
- यूहन्ना 4:16: परमेश्वर जो प्रेम है, उससे प्रेम बनता है और जीवित अनुभव बनता है।
संक्षेप में
1 कुरिन्थियों 13:13 हमें सिखाता है कि विश्वास, आशा और प्रेम—ये तीनों स्थायी हैं, पर प्रेम सबसे महान है क्योंकि वही तीनों को प्रैक्टिकल जीवन में ढालता है और अंतिम सत्य को उजागर करता है। जीवन के हर क्षेत्र में प्रेम ही वह कारण है जो आशा को ठहराव देता है और विश्वास को सक्रिय बनाता है।
उद्धरण और संदर्भ संकेत: इस अनुभाग में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डomेन उद्धरण आवश्यक यदि मिलें, तो नीचे दिए गए प्रमुख विचारों के साथ सम्मिलित होंगे।