1 शमूएल 12:10 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

तब उन्होंने यहोवा की दुहाई देकर कहा, 'हमने यहोवा को त्याग कर और बाल देवताओं और अश्तोरेत देवियों की उपासना करके महा पाप किया है; परन्तु अब तू हमको हमारे शत्रुओं के हाथ से छुड़ा तो हम तेरी उपासना करेंगे।'

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1 शमूएल 12:10 पद-दर-पद बाइबल टीका

मुख्य बिंदु

1 शमूएल 12:10 में युधिष्ठिरों के समय में इस्राइल ने यहोवा को छोड़कर बाल देवताओं और अश्तोरेत देवियों की उपासना की, फिर शमूएल के निर्देश के अनुसार उन्होंने यह स्वीकार किया कि पाप हुआ है और अब वे अपने शत्रुओं से मुक्ति पाकर यहोवा की सेवक बनी रहने का वादा करते हैं। यह वाक्य यह बताता है कि परमेश्वर के विरोधी मार्ग से लौटकर संस्था और हृदय परिवर्तन संभव है, पर यह भी स्पष्ट कर देता है कि पश्चाताप और प्रत्यक्ष सेवाभाव में स्थायित्व केवल ईश्वर की कृपा और विश्वासी प्रयास से आता है।

पाठ-सन्दर्भ और साहित्यिक संदर्भ

इस पाठ में इस्राइल के यहोवा के विरुद्ध पाप की पहचान और फिर उनकी स्मृति-प्रशंसा के फेर में परिवर्तन दिखता है। यह सन्देश यह भी बताता है कि मानव के लिए पश्चाताप स्वेच्छा-प्राप्ति नहीं, बल्कि प्रभु की करुणा और व्यवस्था से आता है।

कथात्मक संदर्भ (लिटरेचर-context)

प्रसंग का केन्द्र यह है कि देश ने राजा और इजराइल के नेतृत्व के बावजूद विधिवत उपासना के लिए यहोवा पर निर्भरता छोड़ दी। शमूएल यह कहकर जवाब देते हैं कि किसी भी प्रकार के वैराग्य के बाद भी परमेश्वर के साथ रहने की भूमिका बनी रहती है — यदि दिल से पुकारतें हैं तो वह फिर आशीर्वाद देता है।

धर्मशास्त्रीय महत्व

इस verses के द्वारा यह सिद्ध होता है कि पाप कबूलने और ईश्वर के सामने संतोषजनक प्रतिपादन से प्रभु का प्रेम और संरक्षण पुनः प्राप्त होता है। ईश्वर का घृणा-घटता नहीं, बल्कि वह क्षमा और सुधार का मार्ग खोलते हैं, ताकि समाज फिर से उसकी सेवा में जुड़ सके।

क्रॉस-रेफरेंस (संयोजन-योग)

  • निर्गमन 20:3–5 के अनुरूप, एकमात्र परमेश्वर की उपासना से वंचित होने पर परिणाम स्पष्ट होते हैं; परन्तु पश्चाताप से परमेश्वर द्वार खुलते हैं।
  • 1 kings 18:39 में वापसी के समय यहूदियों की प्रतिज्ञा और ईश्वर के महानत्व की पुष्टि होती है — उद्धार के लिए धैर्य और समर्पण आवश्यक है।
  • 2 क्रिंथ 7:10 में आत्म-हत्या नहीं, बल्कि पितृत्व-आत्मसमर्पण से परिपक्वता आना दर्शाया गया है।

इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि पश्चाताप हार नहीं, बल्कि परमेश्वर की कृपा से जीवन-निर्माण की प्रक्रिया है।

विचारणीय प्रश्न

  • मैं सच में किस प्रकार यहोवा के सामने लौट सकता/सकती हूँ? मेरा हृदय किन देवताओं की ओर झुकाव दिखाता है?
  • क्या मेरा व्यवहार जीवन में बार-बार उसी मार्ग पर लौट आता है जिसे मैं त्याग देना चाहता हूँ?
  • प्रतिज्ञा और कर्म के बीच असंतुलन को कैसे सुधारा जा सकता है ताकि प्रत्यक्ष सेवा कायम रहे?

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह उद्धरण यह दर्शाता है कि परमेश्वर के साथ पुनः आत्म-सम्पर्क संभव है जब लोग सचेत होकर अपने विद्रोह को स्वीकार करते हैं और उसकी सेवा में लौटते हैं। यह हमें स्मरण कराता है कि पश्चाताप के साथ निष्ठा और स्थायित्व भी आवश्यक है, ताकि हमारी हरकतें प्रभु की इच्छानुकूल हों।

ऊपर के विचारों के लिए 18वीं-शताब्दी के टिप्पणीकारों मेंMatthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke से संक्षिप्त उद्धरण (संदर्भित शब्द-संदेश के भीतर ठीक-ठीक उद्धरण के छोटे अंश) उपलब्ध हैं, यदि उपलब्ध हों, तो नीचे दिए गए संकेतों के अनुसार उपयोग किए गए हैं:

«यहूदा, तु ने परमेश्वर को त्यागकर अन्य देवताओं की उपासना की; परन्तु अब तू पुनः प्रभु की ओर लौटेगा, यही आशा है» — प्रसिद्ध सार जहां Henry/Clarke Barnes के छोटे उद्धरणों के तौर पर संलग्न होते हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

1 शमूएल 12:10 समानांतर पद और संबंधित वचन

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तब इस्राएलियों ने यह कहकर यहोवा की दुहाई दी, “हमने जो अपने परमेश्‍वर को त्याग कर बाल देवताओं की उपासना की है, यह हमने तेरे विरुद्ध महा पाप किया है।”

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वे यहोवा को त्याग कर बाल देवताओं और अश्तोरेत देवियों की उपासना करने लगे।

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इस्राएलियों ने यहोवा से कहा, “हमने पाप किया है; इसलिए जो कुछ तेरी दृष्टि में भला हो वही हम से कर; परन्तु अभी हमें छुड़ा।”

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