1 शमूएल 15:35 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

और शमूएल ने अपने जीवन भर शाऊल से फिर भेंट न की, क्योंकि शमूएल शाऊल के लिये विलाप करता रहा। और यहोवा शाऊल को इस्राएल का राजा बनाकर पछताता था।

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1 शमूएल 15:35 पद-दर-पद बाइबल टीका

शावसान verse का सारार्थ: 1 शमूएल 15:35

इस पद का प्रत्यक्ष संदेश है कि शमूएल किसी भी कारण से शाऊल से भेंट नहीं करते रहे, क्योंकि शाऊल के साथ परमेश्वर की इच्छा का विरोध हुआ और यहोवा ने शाऊल को इज़रायल का राजा बनाकर पछतावा किया।

संदर्भ भूमिका

पद 15 अध्याय में, परमेश्वर ने शाऊल को जहाँ-जहाँ आदेश दिया, वहाँ उसका उत्तर स्थिर नहीं रहा और उसने परमेश्वर के निर्देशों का उल्लंघन किया। प्रेषक के रूप में शमूएल का काम था इस्राएल के इतिहास में ईमानदारी और न्याय की चिन्गारी बनना; पर जब शाऊल नेाध्यक्षता में असफलता दिखाई, तो शमूएल का शांति से भेंट न करना और शाऊल के लिए विलाप करना एक गहरी धार्मिक और नैतिक प्रतिक्रिया है। यह संकेत देता है कि परमेश्वर की योजना के साथ मानव प्रतिरोध के बीच रिश्ता कैसे टूट सकता है, और इस टूटने के बीच भी शमूएल की आध्यात्मिक संवेदनशीलता बनी रही।

Interpretive observations

  • शमरूएल का दूरी बनना एक संकेत है कि शाऊल की स्थिति अस्थिर और निर्णायक रूप से टूट चुकी है; एक नियत समय के बाद परमेश्वर के चयनित दायित्व का निर्वहन अब संभव नहीं रहा।
  • यहोवा का पछतावा शब्द-शास्त्रीय नहीं है; यह संकेत करता है कि परमेश्वर की उद्देश्यों के साथ मानव निर्णयों के परिणाम कितने गंभीर हो सकते हैं।
  • शमूएल की विलाप-भावना न्याय के पक्ष में एक संवेदनशील पुष्टिकरण है—न केवल शाऊल के कर्मों पर, बल्कि इस्राएल की स्थिरता और परमेश्वर के नेतृत्व के प्रति उसकी शांति औरloč जिम्मेदारी का प्रतीक है।

कथनात्मक निष्कर्ष (Theme)

  1. ईमानदारी में आंतरिक संकट का संकेत
  2. परमेश्वर के चयन के साथ मानवीय विफलता की वास्तविकता
  3. नेतृत्व और जवाबदेही के बीच वैचारिक स्पष्टता

संदर्भगत क्रॉस-रेफरेंसेस

  • 1 शमूएल 13:14 — दायित्व की कमी पर परमेश्वर की ओर से विकल्प का परिणाम
  • 1 शमूएल 16:1 — परमेश्वर की नई चयन प्रक्रिया, शाऊल से आगे बढ़ना
  • 1 शमूएल 28:15 — शमूएल की अंतिम उपस्थिति और भविष्य की चेतावनी

संकेतार्थ: ये संदर्भ शाऊल के असफल निर्णयों के प्रभाव और शमूएल के दृष्टिकोण के परिवर्तन को स्पष्ट करते हैं—परमेश्वर की योजना के अनुसार ही सत्ता संचालित होती है, और मानव अवहेलना के बावजूद ईश्वर का उद्देश्य आगे बढ़ता है।

व्यावहारिक निष्कर्ष

हमारे लिए संदेश यह है कि धर्म-निष्ठा और निर्देश-पालन के साथ-साथ, हमें परिणामों के प्रति सचेत रहना चाहिए। यदि हम परमेश्वर की योजना के विरुद्ध चलते हैं, तो नेतृत्व-विश्वास में अस्थिरता आ सकती है; परन्तु ईश्वर के पक्ष में होते हुए भी दयालुता और प्रार्थना की धार बनी रहनी चाहिए, ताकि भ्रम के समय में भीFaithful navigation संभव हो सके।

उद्धरण-उद्धृत उद्धरण: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के स्पष्ट शाब्दिक उद्धरण उपलब्ध हैं तो नीचे संक्षेप में नोट किया गया है—

कई वक्तव्य में यहूदियों के उद्धृत विचार सार्वजनिक-डायरेक्ट स्रोतों से हैं; जहाँ विशिष्ट शब्द-उद्धरण मिलता है, वहाँ केवल आवश्यक भागों को उद्धृत किया गया है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

1 शमूएल 15:35 समानांतर पद और संबंधित वचन

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और उसने भी अपने वस्त्र उतारे, और शमूएल के सामने नबूवत करने लगा, और भूमि पर गिरकर दिन और रात नंगा पड़ा रहा। इस कारण से यह कहावत चली, “क्या शाऊल भी नबियों में से है?”

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“मैं शाऊल को राजा बना के पछताता हूँ*; क्योंकि उसने मेरे पीछे चलना छोड़ दिया, और मेरी आज्ञाओं का पालन नहीं किया।” तब शमूएल का क्रोध भड़का; और वह रात भर यहोवा की दुहाई देता रहा।

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यहोवा ने शमूएल से कहा, “मैंने शाऊल को इस्राएल पर राज्य करने के लिये तुच्छ जाना है, तू कब तक उसके विषय विलाप करता रहेगा? अपने सींग में तेल भर कर चल; मैं तुझको बैतलहमवासी यिशै के पास भेजता हूँ, क्योंकि मैंने उसके पुत्रों में से एक को राजा होने के लिये चुना है*।” (लूका 3:31-32)

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