Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
1 शमूएल 1 1 शमूएल 2 1 शमूएल 3 1 शमूएल 4 1 शमूएल 5 1 शमूएल 6 1 शमूएल 7 1 शमूएल 8 1 शमूएल 9 1 शमूएल 10 1 शमूएल 11 1 शमूएल 12 1 शमूएल 13 1 शमूएल 14 1 शमूएल 15 1 शमूएल 16 1 शमूएल 17 1 शमूएल 18 1 शमूएल 19 1 शमूएल 20 1 शमूएल 21 1 शमूएल 22 1 शमूएल 23 1 शमूएल 24 1 शमूएल 25 1 शमूएल 26 1 शमूएल 27 1 शमूएल 28 1 शमूएल 29 1 शमूएल 30 1 शमूएल 31Verse
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1 शमूएल 15:13 — तत्कालीन संदर्भ और पाठ का अवलोकन
यह आयत शाऊल पर ईश्वरीय आज्ञा के पूर्ण पालन के लिए उसकी धारणाओं और वास्तविक स्थिति को उजागर करती है। शमूएल शाऊल के पास आकर उसे यह बताने जाते हैं कि उसने यहोवा की आज्ञा के अनुसार किया है, पर अंततः परमेश्वर की दृष्टि से उसका मनोभाव प्रथम पंक्ति में शंका और वैधता के साथ नहीं रहा। इस क्षण में दूत-निष्ठा और आत्म-धैर्य का टूटना दिखता है कि केवल औपचारिकता और कर्मसूची नहीं, भीतर की श्रद्धा और अनुपम obedienza भी ज़रूरी है।
यह पाठ परमेश्वर और विश्वास के बारे में क्या बताता है
ईश्वर के साथ वास्तविकता-पूर्ण विश्वास के लिए केवळ बाहरी अवतरण नहीं, वरन् दिल की आस्था और सत्यनिष्ठा चाहिए। शाऊल यह मानता है कि उसने आशीर्वाद प्राप्त किया है और पूरी आज्ञा का पालन किया, पर संदेश यह है कि परमेश्वर इच्छित परिणाम से अधिक, आचरण की सच्चाई को देखता है। यह पुराने नियम में बार-बार देखा गया सिद्धांत है: कर्तव्य के साथ मनुष्य का हृदय भीანში रहें तो वही पूजा स्वीकार नहीं होती।
important शब्दों/छवियों की स्पष्टीकरण
संबद्ध पवित्रशास्त्रीय संदर्भ
उद्धरण-सहायक संदर्भ जो इस पाठ के अर्थ को व्यापक करते हैं:
मौजूदा समय के लिए अनुप्रयोग
- धार्मिक दिखावा बनाम वास्तविक श्रद्धा: हमारे दैनिक विश्वास-विचार में बाहरी कृत्यों पर ही नहीं, आंतरिक समर्पण पर भी विचार करें।
- परमेश्वर की आज्ञाओं को समझना और सही मन से पालन करना: सिर्फ नियमों का पालन नहीं, बल्कि अकालीनता और धर्म-विशेष के साथ प्रेम-उत्पादन भी आवश्यक है।
- आत्म-सत्यापन: कभी-कभी हम अपने कर्मों को मान्यता पाने के लिए मोड़ लेते हैं; परन्तु ईश्वर उचित मनोवृत्ति की प्रतीक्षा करते हैं—ताकि पूजा और जीवन एकरूप हों।
संक्षिप्त समापन
यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि इस संसार में सत्यापित आस्था वही है जो ईश्वर की नज़र में भी सही ठहरे—केवल कर्मयोग नहीं, बल्कि हृदय की निष्ठा और ईमानदारी।
मैथ्यू हेनरी (Matthew Henry) औरAlbert Barnes तथा Adam Clarke के प्रमुख विचार (संक्षेप):
Adam Clarke कहते हैं कि बाहरी आचरण से ईश्वर की कृपा नहीं मिलती; हृदय में परिवर्तन आवश्यक है।
Matthew Henry का संकेत है कि लोग कभी-कभी धार्मिक तपस्या दिखाते हैं, किन्तु परमेश्वर जानता है कि उनका उद्देश्य क्या है।
Albert Barnes के अनुसार यह आयत शाऊल की आत्म-उत्साहिता को उजागर करती है—कि उसने केवल दिखावे के लिए काम किया, आंतरिक निष्ठा नहीं दिखाई।
Cross-reference notes: यह आयत हमें यशायाह 1:11-17, भजन 51:16-17, और 1 समूएल 16:7 के साथ जोड़े प्रयास देता है: बाहरी कर्मों के साथ ईश्वर की दृष्टि और अंतर्दृष्टि भी जरूरी है।