उत्पत्ति 50:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

और उसके चालीस दिन पूरे हुए, क्योंकि जिनके शव में सुगन्ध-द्रव्य भरे जाते हैं, उनको इतने ही दिन पूरे लगते है; और मिस्री लोग उसके लिये सत्तर दिन तक विलाप करते रहे।

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उत्पत्ति 50:3 पद-दर-पद बाइबल टीका

उत्पत्ति 50:3 — चालीस दिन विलाप

परिस्थितिगत प्रयास: जब यूसुफ के पिता याकूब की मृत्यु हो जाती है, तब मिस्र देश में उन सभी के लिए विलाप का कौंधा मचा रहता है। प्रेम और समझ के क्षणों में भी दुख की गहरी आवाज सुनाई देती है। इस वचन में स्पष्ट रूप से दिखता है कि मृत्यु के बादस्थातियाँ कितनी गहरी होती हैं और समाज कैसे दुख व्यक्त करता है।

पाठ का संदेश और विश्वास पर प्रभाव

यह उद्धरण बताता है कि परमेश्वर के लोगों के लिए याद रखने योग्य और सम्मान देने योग्य जीवन-मृत्यु के क्षण कितने गहरे होते हैं। चालीस दिनों का विलाप और सुगन्ध-द्रव्यों की व्यवस्था एक पुराने सभ्यता-भर की मान्यता है ताकि जीवन की मह्यता और मृत परिश्रम की गहराई को मान्यता मिल सके। इसके माध्यम से यह दिखाया गया है कि भगवान की unseen सुरक्षा के साथ भी मानवीय संवेदना और सामाजिक मान्यताएं कैसे मिलकर व्यक्त होती हैं।

शब्दों और कल्पनाओं की स्पष्टता

– सुगन्ध-द्रव्य: यह मृत व्यक्तित्व के लिए सम्मान और स्मृति को दर्शाता है; यह सम्मान और शांति के प्रतीक के तौर पर दिया गया।

– सत्तर दिन तक विलाप: यह दिखाता है कि मृत्यु के बाद समाज का दु:ख कितनी दृढ़ता से अनुभव किया गया। यह समय-सीमा मानव-परंपराओं का संकेत है कि कैसे परिवारजन और समाज दुख बाँटते हैं।

अनुसंग वीडियो (Cross-references)

  • भूमि-विश्राम और स्मृति: अतः दूसरे स्थानों पर भी अनुशासन और शोक का समय वर्णित है; यह मानवीय जीवन की नाजुकता को दर्शाता है। (उत्पत्ति 23:2; नीतिमान 1:12-13)
  • दया और उद्धार की स्मृति: सुसमाचार के प्रकाश में भी मृत्यु के बाद की संवेदना और सम्मान एक मूल्य है।
  • कथन-स्वर: परिवार और रिश्तेदारों के साथ दुःख बाँटना समुदाय की आस्थागत संरचना को मजबूत करता है।

पवित्रशास्त्रीय संदर्भ और विचार

प्लेटफॉर्म-गठन में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणियों से संकलित विचार इस प्रकार समाहित होते हैं:

– Henry कहते हैं कि यह समय मोहताज-गुण को नहीं बल्कि सार्वजनिक स्नेह और श्रद्धांजलि के महत्व को दर्शाता है, क्योंकि मौत के बाद भी आत्मीयता जीवन-यात्रा को मजबूत बनाती है। (रूढ़ी-प्रज्ञा के साथ मृत्यु पर संवेदना)

– Barnes द्वारा कहे अनुसार; विलाप सामाजिक-आचार का एक भाग है जो दुख की वास्तविकता को स्वीकार करता है और शोक-समय में स्मृतियों को संजो कर रखता है।

– Clarke बताते हैं कि ऐसे समयों में धार्मिक विश्वास यह समझ देता है कि मृत्यु एक निश्चित मार्ग है और परम-श्रेष्ठता के प्रति श्रद्धा बनी रहती है, जबकि मानवीय अनुचित क्रिया या अत्यधिक विलाप से बचना चाहिए।

चालू पठन-प्रेरणा

आज के पाठक के लिए यह संदेश है कि जीवन के प्रिय लोगों के निधन पर समुदाय एकता के साथ शोक मनाए और ईश्वर की व्यवस्था को याद रखे। दुख-केवल संवेदना नहीं, बल्कि परमेश्वर की उपस्थिति को मानने का अवसर भी बनता है।

आज के लिए 2-3 सटीक आत्म-समीक्षा बिंदु

  • अपने दुख के साथ ईश्वर की ओर दौड़ें; शोक में भी प्रार्थना और आशा बनाए रखें।
  • परिवार और समुदाय के लिए सम्मान-भरी स्मृतियाँ बनाएं ताकि दुःख पुनर्जीवित न हो, बल्कि स्मृति में जीवन पनपे।
  • हताशा से बचते हुए धार्मिक दृष्टि से मृत्यु को जीवन के पूर्ण चक्र का हिस्सा मानें।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

उत्पत्ति 50:3 समानांतर पद और संबंधित वचन

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और जब इस्राएल की सारी मण्डली ने देखा कि हारून का प्राण छूट गया है, तब इस्राएल के सब घराने के लोग उसके लिये तीस दिन तक रोते रहे। (उत्पत्ति. 50:3, व्यवस्थाविवरण. 34:8)

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और इस्राएली मोआब के अराबा में मूसा के लिये तीस दिन तक रोते रहे; तब मूसा के लिये रोने और विलाप करने के दिन पूरे हुए।

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उत्पत्ति 50:10 (HINIRV) »
जब वे आताद के खलिहान तक, जो यरदन नदी के पार है, पहुँचे, तब वहाँ अत्यन्त भारी विलाप किया, और यूसुफ ने अपने पिता के लिये सात दिन का विलाप कराया।

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