Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52



यिर्मयाह 45:4 का पाठ—सं Contextual पारीकथा
यिर्मयाह 45 अध्याय में यिर्मयाह को बन्धनों और कठिनाईयों के बीच संदेश दिया गया है कि परमेश्वर का उद्देश्य स्थिर रहता है, भले ही राजा-युगल और नगर-दुर्दशा क्यों न आ जाए। इस verse में यह स्पष्ट है कि यहूदा में होने वाले विनाश की योजना ईश्वर के नियंत्रण में है, और वह अपने लोगों के हर भाग्य को जानता है। यह चेतावनी नहीं, बल्कि एक सन्निकट भविष्य के बारे में संकेत है कि जो कुछ प्रयास किया गया है, उसे एक नया मोड़ मिल सकता है यदि जनता परमेश्वर के साथ भरोसा रखे।
मुख्य विषय और अर्थ
यिर्मयाह 45:4 एक कठोर, पर निर्देशात्मक वक्तव्य है—यहोवा कहता है कि वह उस देश को ढा देगा जिसे उसने बनाया है और जिन पौधों को रोपा गया है, वे ही उखाड़ फेंके जाएँगे। यह विनाश का दायरा, अस्थायी असंतोष और भाग्य की अटूटता बताता है। साथ ही यह भी संकेत है कि परमेश्वर के न्याय के समय-रेखा स्वयं निर्धारित है; मानव गतिविधियाँ भले clap-फिंगर करती रहें, परमेश्वर का उद्देश्य पूरा होगा।
दो-तीन प्रमुख विचार
हेतु-चिन्तन और अन्य विचारधाराओं के साथ संबद्ध पाठ
यह संकेत देता है कि परमेश्वर के निर्णय में स्थिरता है—यह पुष्टि पुराने नियम के अन्य भागों से मिलती है जहाँ नगरों के विनाश के बीच भी मिसालें मिलती हैं कि क्यों और कैसे परमेश्वर अपने लोक के लिए सुधार का मार्ग खोलता है।
क्रियात्मक स्पर्श: इस पंक्ति के संदर्भ में, लोग अपनी स्थिति से हटकर ईश्वर के पास लौटें—शक्ति, सुरक्षा और आशा के स्रोत के रूप में परमेश्वर भरोसे के साथ चलें।
संदर्भ-गमन
1) भविष्य-निर्णय के संकेत: Jeremiah में अक्सर कहा गया है कि देव-निर्णय समय के साथ स्पष्ट होगा; यह verse उसी ध्वनि का भाग है कि दुष्ट के लिए भी एक सीमा है।
2) एक साथ पुनर्गठन की संभावना: विनाश के बाद पुनर्स्थापना का रास्ता बनता है, जब लोग प्रभु के साथ अपने रिश्ते को ठोस करें।
3) न्याय और दया का संतुलन: यह वाक्य न्याय की ताकत दिखाता है साथ ही दया की संभावना पर भी संकेत देता है—ताकि परमेश्वर के लोग पुनः विश्वास-आधार पर खड़े हों।
व्यावहारिक प्रतिबिंब
जीवन के कठिन समय में भी परमेश्वर का नियंत्रण स्पष्ट रहता है। हमें यह विचार ऊर्जा देता है कि हम प्रयास करके भी प्रभु की इच्छा को समझें और अपनी स्थिति को उनके उद्देश्य के अनुरूप ढालें। आत्म-आलोचना, नम्रता और विश्वास के साथ प्रार्थना करें; अपने परिवेश में विनाशात्मक स्थितियों के बीच आशीषों की तलाश करें।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 45:4 बताता है कि यहोवा सत्ता और नियती के अधिकारी हैं; जहाँ लोग रोते-चिल्लाते हैं, वहीं परमेश्वर की योजना चलती है। विनाश की चेतावनी के साथ भी भविष्य के पुनर्निर्माण की संभावना निहित है—यदि राष्ट्र अपने परमेश्वर के साथ लौटे और विश्वास से चले।
cross-references
यिर्मय 18:7-10: परमेश्वर के निर्णय बदल सकते हैं यदि लोग remorse और वापस लौटें; यह verse उसी विषय को पुष्ट करता है कि ईश्वर की प्रतिज्ञा और निर्णय स्थिर हैं, परंतु उनकी दिशा पर मानवीय प्रतिक्रियाएं प्रभाव डालती हैं।
यरम 29:11: भविष्य की योजना की आशा—ईश्वर कहते हैं कि उसकी योजनाओं में बेहतरी है; यह पिता-प्रेम की दिशा में एक संकेत है जो भाग्य की धुरी है।
रेख-उद्धार के संकेत: व्यवस्थागत न्याय के बीच भी दया और पुनर्स्थापना के अवसर रहते हैं, जैसा कि पुराने वचनों में भी मिलते हैं।
नोट: इस पाठ के लिए सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के विचारों के सार को समाहित किया गया है—मैथ्यू हेेनरी, आॅल्बर्ट बार्न्स और अडम क्लार्क के संकलन के संकेत-उद्धरण यदि उपलब्ध हों, तो छोटे-छोटे शब्दों में उद्धृत किए जा सकते हैं।