Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52



यिर्मयाह 47:7 पर टिप्पणी — अश्रकोलन और समुद्रतट के विरुद्ध ठहरना
यह वाक्या हमारे लिए संकेत करता है कि परमेश्वर का आदेश और उसकी संकल्पना विश्व के सभी चौकसी संरचनाओं पर प्रभाव डालती है। जब परमेश्वर ने अश्कलोन और समुद्रतट के विरुद्ध ठहराने का हुक्म सुनाया, तब वह क्षेत्रीय सीमाओं की नहीं बल्कि लोगों के हृदयरूपी अग्रभागों की भी परीक्षा कर रहा था। इस वचन में स्थिरता, न्याय और दया के साथ-साथ प्रभुसत्ता की गूंज सुनाई देती है: भगवान ने वही किया जो उचित है, और उनके दायरे में लोग अपनी नियति के समक्ष निर्भर रहते हैं।
प्रारंभिक संदर्भ और संदेश
यिर्मयाह उन दिनों बिखरी हुई इब्रानी जनता को देश के भीतर जा रही विपत्तियों के बीच नयी आशा का संदेश देता है। 47 अध्याय में यहיחोवा के न्याय के साथ आश्वस्त कर रहा है कि बुराई के शक्तियों पर भगवान की पकड़ है। verse 7 में कहा गया है कि तू कैसे थम सकती है? क्योंकि यहोवा ने तुझको आज्ञा देकर अश्कलोन और समुद्रतट के विरुद्ध ठहराया है। यहां “तू” वह समाज है जो परमेश्वर के आदेश के कारण क्रिया-प्रतिक्रिया कर रहा है; ठहरना एक एक्शन-आर्डर है जो सीमा-रेखा बनाकर आक्रमण की दिशा तय करता है।
मुख्य संदेश का सार
1) प्रभु की आज्ञा निर्णायक है: जब परमेश्वर किसी क्षेत्र की सुरक्षा या विध्न को स्थापित कर देता है, तब वह मार्ग बन जाता है।
2) डर के बजाय विश्वास: अश्कलोन और समुद्रतट जैसे स्थान रणनीतिक महत्व के प्रतीक हैं; लोगों के लिए सम्मानित सीमा-रेखा बनती है जिन पर耶和華 की शक्ति स्पष्ट होती है।
3) न्याय और दया का संतुलन: यहोवा न्यायी है, परन्तु उसकी तैयारी में दया और संरक्षण की राह भी खुलती है—क्योंकि उसके आदेश से लोग सचेत और अपेक्षित रहते हैं।
विशेष विचार और थीम
- प्रभुत्व और सीमा: परमेश्वर ने जगह-जगह की सीमाओं के साथ एक सुरक्षित व्यवस्था दी है ताकि लोग भटकाव से बचें।
- प्रतिरोध के समय प्रार्थना और विश्वास: कठिन समय में भी परमेश्वर के विरुद्ध न खड़ा होकर, उसकी योजना में सहभागिता संभव होती है।
- स्मरण और वचन का प्रभाव: यह वचन हमें स्मरण कराता है कि ईश्वर की योजना में हर सीमा का अपना उद्देश्य है।
उपयोगी क्रॉस-रेफरेंसेज
- यह्सा 54:15—जो लोग अलग-थलग हों, वे भी आशीषों में भागीदार बनते हैं जब परमेश्वर अपनी शरण देता है। यह विचार संदर्भ बनता है कि सीमा-निर्देशन का लक्ष्य सुरक्षित समुदाय है।
- नीतिवाक्य 21:1—कहराने के समय भी परमेश्वर के मार्ग बड़े हो सकते हैं; आदेश उनके हाथ में है, जो न्यायपूर्ण मार्ग पर चलते हैं।
- यीशु के उदाहरण: आत्म-समर्पण और सुरक्षा का स्रोत वही है जो परमेश्वर के द्वारा निर्धारित है; विश्वास के साथ चलना प्रत्येक बाधा को पराजित कर सकता है।
प्रेरणा-दे देने वाला निष्कर्ष
जब आस्थागत आशंकाओं के बीच भी हमें यह याद रहे कि यहोवा ने ठहराने का आदेश दिया है, तब भय नहीं बल्कि स्थिर विश्वास उभरता है। अश्कलोन और समुद्रतट जैसे प्रतीकों के पीछे यह संदेश है: अभ्यास और प्रवृत्ति के क्षेत्र में हमारा स्थायित्व परमेश्वर की और से आता है। यह वचन हमें यह सिखाता है कि प्रभु की योजना में सुरक्षा है और हमारे जीवन के हर कदम पर उसकी आज्ञाओं का पालन ही सही दिशा प्रदान करता है।
ध्यानयोग्य उद्धरण ((public domain commentators) से संकल्प)
Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke में से कुछ पंक्तियाँ जो इस पाठ के भाव को सहायक रूप से स्पष्ट करती हैं, वे नीचे संकेतित हैं:
टिप्पणीकारों के सारभूत विचार इन बिंदुओं में समाहित रहते हैं: परमेश्वर की आज्ञा भरोसे के साथ आना चाहिए, ताकि भय के वातावरण में भी साहस बना रहे और नैतिक-आदेशों के अनुरूप वे कर सकें जो सत्य के प्रकाश में उचित हैं।