यहोशू 5:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

क्योंकि इस्राएली तो चालीस वर्ष तक जंगल में फिरते रहे, जब तक उस सारी जाति के लोग, अर्थात् जितने युद्ध के योग्य लोग मिस्र से निकले थे वे नाश न हो गए, क्योंकि उन्होंने यहोवा की न मानी थी; इसलिए यहोवा ने शपथ खाकर उनसे कहा था, कि जो देश मैंने तुम्हारे पूर्वजों से शपथ खाकर तुम्हें देने को कहा था, और उसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं, वह देश मैं तुम को नहीं दिखाऊँगा।

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यहोशू 5:6 पद-दर-पद बाइबल टीका

यहोशू 5:6 पर व्याख्या—हर क्षणिक निश्चय बनाम अविश्वास

मतलब साफ है: इस्राएल के यहोशू-युग की कठिनाई यह नहीं थी कि देश ज्यों का त्यों मिल गया, बल्कि जंगल-यात्रा के चालीस वर्षों के बाद भी उनकी दृष्टि में नयापन नहीं आया; वे वही प्रजा बनी रहीं, जिन्होंने मिस्र से निकलकर परमेश्वर के वचनों से सीखा नहीं। जिन्होंने अपने दम पर आगे बढ़कर विश्वास नहीं किया, वे अंततः वह देश नहीं पाकर रहे जो दादा-दादाओं को मिला था।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

यहोशू 5 अध्याय में इस्राएल के जंगल से निकलकर वायदे के देश के प्रवेश-पूर्व तैयारी का चित्र है। चालीस वर्षों की मार्ग-यात्रा के बाद, मिस्र से निकली वे जीवित पीढ़ियाँ पुरानी थीं; उनके बच्चों ने भगवान के नियमों के अनुसार जीवन जीना सीखा। लेकिन जिन लोगों ने युद्ध-योग्यता के कारण मिस्र से निकलते समय जीवित रहने का भरोसा किया था, वे प्रकटतः गायब हो गए। ऐसा इसलिए कि उनमें इस्रालियों के प्रायः पथभ्रष्ट होने के कारण शपथ-युग के देश तक पहुँच नहीं मिली।

मुख्य विचार

  • ईश्वर की शपथ और उसकी अवधि: परमेश्वर ने इस देश के लिए यहूदियों को वचन दिया था, परन्तु अविश्वास के कारण वह देश उनके देखने से दूर रहा।
  • विश्वास बनाम संदेह: 40 वर्ष की निरंतर यात्रा भी अगर सीख दे, तो वह तब तक सार्थक है जब तक जीवित पीढ़ियाँ विश्वास को अपनी दैनिक जीवन-रेखा में न अपनाएं।
  • यही समयकट यहोवा के उद्धार के मार्ग की पुष्टि करता है कि एक पीढ़ी नई चेतना के साथ आगे बढ़े, ताकि दायित्व समझे जाएं।

विश्लेषण—प्रत्यक्ष टिप्पणियाँ

यहोशू 5:6 यह बताता है कि जंगल-यात्रा और वंश-उत्पत्ति के साथ आने वाले पुरस्कार एक ही समय पर नहीं मिलते। जिन्होंने निरंतर अविश्वास बनाये रखा, वे युद्ध-योग्यता के साथ देस-प्राप्ति के भागीदार नहीं बने। यह उद्धार-यात्रा में आस्था की नीति और प्रभु-उद्धार के कमान के बीच संतुलन को दर्शाता है।

2-3Cross-References

देवयानी दृष्टि: यहोशू 1:6-7—आस्थागत दृढ़ता और भविष्य के लिए निर्देश; यह बताते हैं कि परमेश्वर के वचन के अनुसार चलना ही सफलता का मूल है।

यहोशू 24:14-15—परमेश्वर के सामने निर्णय की स्पष्टता; किस दिशा में जीवन बिताना है, यह एक बार नहीं, निरंतर चयन है।

निर्गमन 32:11-14—परमेश्वर की करुणा और प्रतिज्ञान, जिसमें लोगों के परिवर्तन के लिए दया-याचना और फिर निर्णय आते हैं।

कायदेवार निष्कर्ष

जो लोग शपथ-युग के देश को पाने के लिए एक नई आस्था-यात्रा नहीं अपनाते, वे परिवर्तन-यात्रा से चूक जाते हैं। परमेश्वर के वचन पर दृढ़ विश्वास ही परमधाम की कुंजी है।

छोटा व्यवहारिक takeaway

कथा से एक प्रेरणा

इस अध्याय की प्रेरणा यह है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा पूर्ण हो सकती है, बशर्ते हम अविश्वास नहीं करें और स्पष्ट आस्था के साथ निर्भीक होकर आगे बढ़ें।

सूचना: नीचे उद्धरण आवश्यकतानुसार Matthew Henry, Albert Barnes तथा Adam Clarke के सार्वजनिक-डायरे के मौलिक विचारों से समन्वित हैं; यदि कोई सटीक छोटा उद्धरण मिलें, वहाँ स्पष्ट उल्लेख दिया गया है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यहोशू 5:6 समानांतर पद और संबंधित वचन

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इसलिए जिस देश के विषय मैंने उनके पूर्वजों से शपथ खाई, उसको वे कभी देखने न पाएँगे; अर्थात् जितनों ने मेरा अपमान किया है उनमें से कोई भी उसे देखने न पाएगा। (1 कुरि. 10:5)

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और हमारे कादेशबर्ने को छोड़ने से लेकर जेरेद नदी पार होने तक अड़तीस वर्ष बीत गए, उस बीच में यहोवा की शपथ के अनुसार उस पीढ़ी के सब योद्धा छावनी में से नाश हो गए।

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व्यवस्थाविवरण 1:3 (HINIRV) »
चालीसवें वर्ष के ग्यारहवें महीने के पहले दिन को जो कुछ यहोवा ने मूसा को इस्राएलियों से कहने की आज्ञा दी थी, उसके अनुसार मूसा उनसे ये बातें कहने लगा।

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