न्यायियों 11:30 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

और यिप्तह ने यह कहकर यहोवा की मन्नत मानी, “यदि तू निःसन्देह अम्मोनियों को मेरे हाथ में कर दे,

न्यायियों 11:30 पद-दर-पद बाइबल टीका

न्यायियों 11:30 का हिन्दी टिप्पणी (HINIRV)

पद का संदर्भ: न्यायियों 11:30 — “और यिप्तह ने यह कहकर यहोवा की मन्नत मानी, यदि तू निःसन्देह अम्मोनियों को मेरे हाथ में कर दे,”

पद का संक्षिप्त परिचय और संदर्भ

यिप्तह इस्राएल के न्यायी थे, जिनकी कथा राबा-गलह के अन्दर आक्रमण और आशीष के बीच घूमती है। यहाँ वे युद्ध से पहले ईश्वर से संकल्प लेते हैं कि यदि वह उनकी विजय कर दें, तो वह ईश्वरीय प्रस्तावित मूर्ति-समर्पण के स्थान पर एक वचन देते हैं। यह मन्नत वह ईश्वर की कृपा, सुरक्षा और विजय के प्रतीक के रूप में करते हैं।

मौलिक अर्थ और केंद्रीय संदेश

यह वचन ईश्वर की सहायता पर निर्भर रहने की प्रधानता को दर्शाता है। यिप्तह की मन्नत में एक बार फिर यह स्पष्ट है कि वह अपने संघर्ष को स्वयं की शक्ति से नहीं, बल्कि परमेश्वर की कृपा से जीतना चाहता है। इस तरह वह इस्राएली नेतृत्व की आत्म-विश्वास-आसक्ति के बीच एक पंक्ति खींचते हैं: कठिन समय में भी परमेश्वर के साथ निर्भरता सफलता की कुंजी है।

मुख्य विषय—तीन रूप में

  • ईश्वर-निर्भरता: यिप्तह का वचन यह दिखाता है कि विजय परमेश्वर के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसकी योजना के अनुरूप है—हम अपनी मंशाओं को नहीं, बल्कि उसकी इच्छा को मानते हैं.
  • वचन और प्रतिज्ञा: मन्नत एक विशेष प्रतिज्ञा है जो यिप्तह की आत्म-समर्पण और ईश्वर के साथ टकराव से बचने के लिए है; यह अभिशाप और आशीर्वाद की कड़ी में है।
  • आत्मिक एकता बनाम मानवीय असफलता: युद्ध की तैयारी में एकता और समन्वय आवश्यक हैं, किन्तु अंततः ईश्वर की सहायता ही निर्णायक होती है।

संबंधित भागों के द्वार

1) न्यायियों 11:11-29 — यिप्तह का संक्षिप्त युद्ध-योजना और अन्याय के विरुद्ध उनका संघर्ष; यह दिखाता है कि परमेश्वर के साथ समझौता कैसे निर्धारित मार्ग देता है।

2) उत्पत्ति 22:16-18 के संरचनात्मक सिद्धांत—प्रतिज्ञाओं की महत्ता और दायित्व की पुष्टि; यह बताता है कि परमेश्वर की देन पर हमारा जवाब कैसे बनना चाहिए।

3) वहीएएल 12:6 जैसे भविष्यवाणी-संबंधी उदाहरण—हालाँकि कथा-वस्तु अलग है, परन्तु प्रतिज्ञाओं के मान-अवसर कैसे एक विशेष आशीष से जुड़ते हैं, यह समझ में आता है।

व्यावहारिक विचार

हमारे जीवन में भी कभी-कभी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियाँ सामने आती हैं जहां मानव-योजना असफल हो जाती है। इस स्थिति में उस प्रथम वचन का स्मरण करें जो कहता है—ईश्वर के साथ सहमत रहें, न कि अपनी सूझ-बूझ से अपने मार्ग चुनें। अठखेलियाँ करने के बजाय, प्रार्थना और विश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

संक्षेप और समापन

न्यायियों 11:30 में यिप्तह की मन्नत एक मार्गदर्शक उदाहरण है कि विजय की चाबी परमेश्वर की इच्छा के साथ निर्भर रहना है। यह हमें याद दिलाता है कि कठिन समय में भी ईश्वर के साथ प्रतिज्ञा और एकात्मता sustainer बनती है, और हमारी शक्ति से अधिक परमेश्वर की कृपा होती है।

पवित्र-आधारित संकेत

यहाँ चारित्रिक सूत्र हैं जो देखने योग्य हैं: ईश्वर-निर्भरता, प्रतिज्ञा का बज्र, एकता और उचित तैयारी।

आर्काय-वाक्य संक्षेप

यिप्तह की मन्नत यह दिखाती है कि ईश्वर के हाथों में ही हमारा परिणाम है; हम अपनी योजना को छोड़कर उसकी इच्छा में समर्पण करें, ताकि वह हमारी राह दिखाए और विजय उसे ही मिले।

अनुशंसित क्रॉस-रेफरेंसेस

यशाय 41:10 — ईश्वर की उपस्थिति और सहायता से डर दूर होता है, विश्वास बढ़ता है; यह संदर्भ यह दिखाता है कि परमेश्वर के साथ निर्भरता कितनी मंत्री है।

यहोशू 1:9 — साहस और निर्भय रहने की प्रेरणा, परमेश्वर की उपस्थिति के कारण।

2 कुरिन्थियों 12:9 — कमजोरी के बीच भी ईश्वर की कृपा शास्त्र-उद्धार में मार्गदर्शक होती है।

उद्धृत उल्लेख: इस पाठ के भीतर Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के स्पष्ट शब्द सीधे उद्धृत नहीं होते, पर उनके सामान्य चर्चन से उत्तराधिकारित बोध निहित है। उनकी विचारधारा के अनुसार, “व्यक्ति की मन्नत और ईश्वर की इच्छा” के बीच संतुलन पर बल दिया गया है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

न्यायियों 11:30 समानांतर पद और संबंधित वचन

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