Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
न्यायियों 20:1 न्यायियों 20:2 न्यायियों 20:3 न्यायियों 20:4 न्यायियों 20:5 न्यायियों 20:6 न्यायियों 20:7 न्यायियों 20:8 न्यायियों 20:9 न्यायियों 20:10 न्यायियों 20:11 न्यायियों 20:12 न्यायियों 20:13 न्यायियों 20:14 न्यायियों 20:15 न्यायियों 20:16 न्यायियों 20:17 न्यायियों 20:18 न्यायियों 20:19 न्यायियों 20:20 न्यायियों 20:21 न्यायियों 20:22 न्यायियों 20:23 न्यायियों 20:24 न्यायियों 20:25 न्यायियों 20:26 न्यायियों 20:27 न्यायियों 20:28 न्यायियों 20:29 न्यायियों 20:30 न्यायियों 20:31 न्यायियों 20:32 न्यायियों 20:33 न्यायियों 20:34 न्यायियों 20:35 न्यायियों 20:36 न्यायियों 20:37 न्यायियों 20:38 न्यायियों 20:39 न्यायियों 20:40 न्यायियों 20:41 न्यायियों 20:42 न्यायियों 20:43 न्यायियों 20:44 न्यायियों 20:45 न्यायियों 20:46 न्यायियों 20:47 न्यायियों 20:48



न्यायियों 20:37 का अर्थ और संदर्भ
इस पद में गिबा नगर के विरुद्ध फिलिस्तीन-गुलामों के युद्ध-घटना का उल्लेख है। पहले ही अध्याय में यह बताया गया है कि इश्वरीय युद्ध में वीरों ने घातक चालें चलीं, परन्तु न्यायियों 20:37 में घातक लोग फुर्ती से आकर गिबा पर झपटते हैं और नगर को तलवार से मार डालते हैं। यह दिखाता है कि युद्ध-योजनाओं के कारण नगर-जीवन असुरक्षित हो गया और भीतर रहने वाले लोगों पर अकाल-तकलीफ आ पड़ी। यह संदेश धीरे-धीरे न्याय और दया के विमर्श में एक दुखद परिणाम के रूप में उभरता है: एक आक्रमण ने निर्दोषों को भी प्रभावित किया।
केंद्रीय अर्थ
यह verses में दिखते हैं कि घातक चालें और तेज आक्रमण कितने विनाशकारी हो सकते हैं। गिबा जैसे नगरों के भीतर, जहाँ लोग शांति से रहते हैं, वहां एक अचानक, तेज हमला सब कुछ बदल देता है। भगवान की योजनाओं के भीतर भी मानव-युद्ध के कारण पीड़ित होते हैं, और यह पंक्ति इस तथ्य को उद्घाटित करती है कि युद्ध के समय दया और न्याय के लिए मार्ग अस्पष्ट हो सकता है।
मुख्य विषय
Cross-reference और संक्षिप्त व्यাখ्या
- यशायाह 59:11 जैसे पाठ्यांश एक समान भाव में बताते हैं कि युद्ध और हिंसा मानवजाति के कारण होते हैं; यह भाग भी यह स्मरण कराता है कि दया और न्याय के निर्माण हेतु और परमेश्वर के साथ मिलकर शांति बनाए रखना आवश्यक है।
- भजन 18:35-36 में दिव्य सहायता के द्वारा विजय और सुरक्षा का विश्वास प्रकट होता है; यहाँ भी सुरक्षा के लिए परमेश्वर की सहायता का आश्रय समझना उपयुक्त है।
-_raw cross-reference: न्यायियों 4-5 के भीतर भी इसी प्रकार के आक्रमण और सैनिक-चालों का चित्रण है, जो न्याय के क्षेत्र में रणनीतिक विवेक की मांग दिखाते हैं।
व्यावहारिक चिंतन
इस verse से एक पाठ यह है कि जीवन के असुरक्षित क्षणों में भगवत-आशीर्वाद और समुदाय की एकता कितनी आवश्यक है। युद्ध के समय में भी एक दूसरे के लिए सुरक्षा और मानवीय व्यवहार बनाए रखना चाहिए। परमेश्वर के पीछे रहने वाले समुदायों के लिए यह स्मरण दिलाता है कि न केवल बाह्य हथियारों से, बल्कि आंतरिक विश्वास-स्थिरता से भी रक्षा होती है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
न्यायियों 20:37 बताता है कि चित्त-वृत्ति से प्रेरित आक्रमण कितने विनाशकारी हो सकते हैं, और यह संदेश देता है कि परमेश्वर के लोगों के लिए भरोसा, एकता और न्याय-संगत आचरण ही सुरक्षा का मार्ग है।
महत्वपूर्ण उद्धरण (प्रमुख प्रचारक स्रोतों से)
यहां उपलब्ध उद्धरणों में प्रचारकों के विचारों के संक्षिप्त संदर्भित सार हैं, जो सार्वजनिक dominio के अंश हैं। यह पंक्तियाँ केवल संदर्भ के लिए हैं और पूर्ण पाठ नहीं हैं:
Matthew Henry (टिप्पणियाँ): “...,” उद्धरण उपलब्ध नहीं होने पर सामान्य सारांश
Albert Barnes (टिप्पणियाँ): “...” उद्धरण उपलब्ध नहीं होने पर सामान्य सारांश
Adam Clarke (टिप्पणियाँ): “...” उद्धरण उपलब्ध नहीं होने पर सामान्य सारांश
इनमें से यदि किसी भी commentary से स्वीकृत छोटे उद्धरण उपलब्ध होते, तो वही सीधे उद्धरण यहाँ बताये जाते, अन्यथा मूल विचार एक साथ समाहित किए गए हैं।