Old Testament
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यहोशू 6:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
और जब वे मेढ़ों के सींगों के नरसिंगे देर तक फूँकते रहें, तब सब लोग नरसिंगे का शब्द सुनते ही बड़ी ध्वनि से जयजयकार करें; तब नगर की शहरपनाह नींव से गिर जाएगी, और सब लोग अपने-अपने सामने चढ़ जाएँ।”
यहोशू 6:5 पद-दर-पद बाइबल टीका
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यहोशू 6:5 समानांतर पद और संबंधित वचन
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इब्रानियों 11:30 (HINIRV) »
विश्वास ही से यरीहो की शहरपनाह, जब सात दिन तक उसका चक्कर लगा चुके तो वह गिर पड़ी। (भज. 106:9-11, यहो. 6:12-21)

2 कुरिन्थियों 10:4 (HINIRV) »
क्योंकि हमारी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं, पर गढ़ों को ढा देने के लिये परमेश्वर के द्वारा सामर्थी हैं।

निर्गमन 19:19 (HINIRV) »
फिर जब नरसिंगे का शब्द बढ़ता और बहुत भारी होता गया, तब मूसा बोला, और परमेश्वर ने वाणी सुनाकर उसको उत्तर दिया।
संदर्भ और संक्षिप्त व्याख्या
यहोशू 6:5 उस घटनाक्रम का हिस्सा है जब इस्राएल की सेना ने यरूशलेम के सामने स्थित जेरिको नगर को घेर लिया। भगवान ने योशूआ को असामान्य निर्देश दिया—सात दिन तक हर दिन मादी (मेढ़ों के सींग) के साथ नगर की परिक्रमा करना, और सातवें दिन सात बार परिक्रमा कर के मन में एक साथ जयघोष करना। श्लोक में बताया गया है कि नरसिंगे की लंबी फूँक के साथ सब लोग एक बड़ी ध्वनि से जयजयकार करेंगे; तब नगर की दीवारें अपने नींव से ढह जाएँगी और सब लोग सीधे नगर में प्रवेश करेंगे।
मुख्य अर्थ
यह वचन दिखाता है कि विजय आध्यात्मिक आज्ञा पालन और परमेश्वर के विलक्षण उपायों से आती है, न कि केवल मानवीय शक्ति या रणनीति से। दीवारें प्राकृतिक कारण से नहीं, बल्कि परमेश्वर की शक्ति से गिरती हैं—जब लोगों ने ईश्वर के निर्देशों के अनुसार भरोसे के साथ आवाज उठाई। सुनने तथा एक जुट होने का पल निर्णायक है: नरसिंगे की एक सामूहिक ध्वनि के साथ ही परिवेश बदल गया।
मुख्य विषय
सम्बन्धित शास्त्रपद
यशायाह 30:31-33 में भी ईश्वर की शक्ति और तुला की तरह विभाजित प्रकोप का वर्णन मिलता है, जो युद्ध और नगर विनाश के संदर्भ से जुड़ा है — यह दिखाता है कि परमेश्वर युद्धों के समय निर्णायक होता है।
1 सोम 14:38-45 में भी सामूहिक आवाज़ और युद्ध में प्रभु की ओर आशा के कारण विजय का संकेत मिलता है—यहाँ भी लोगों की एकता और प्रभु की दिशा निर्णायक है।
भजन संहिता 46:1-7 में परमेश्वर को शरण और निकट सहायता बताया गया है; संकट में निर्भय होना और परिश्रम से परे परमेश्वर पर निर्भरता की आवश्यकता पर यह पद प्रकाश डालता है।
व्यावहारिक चिंतन
यह श्लोक आज के जीवन में हमें सिखाता है कि कभी-कभी ईश्वर की योजनाएँ हमारी सामान्य सोच में नहीं बैठतीं। व्यक्तिगत या सामुदायिक कठिनाइयों के समय संकेतों और आज्ञाओं का पालन, धैर्यपूर्ण अनुशासन और एकजुट विश्वास अक्सर बदलने की कुंजी होते हैं। जब भय या तर्क हमें रोकें, तब सामूहिक प्रार्थना, आज्ञापालन और ईश्वर पर भरोसा चमत्कार के मार्ग खोल सकते हैं।
पुरानी टिप्पणीकारों से संक्षिप्त संकेत
मैथ्यू हेनरी ने इस कहानी को ईश्वर की रहनुमाई पर अनुशासन और विश्वास की परीक्षा के रूप में देखा। अल्बर्ट बार्न्स ने इस पर उल्लेख किया कि यह विभूति-पूर्ण विजय ईश्वर की महिमा दर्शाती है, न कि मनुष्यों की कौशल। एडम क्लार्क ने स्थानिक और प्रकार-प्रतीकात्मक दृष्टि से लिखा कि यह घटना आत्मिक युद्ध में ईश्वर की सहायता का संकेत है। (उदाहरणार्थ, ये टिप्पणीकारों के संक्षेपित विचार हैं; यदि आप किसी के उद्धरण की सटीक लाइन चाहते हैं तो कृपया बतायें।)
संक्षेप
यहोशू 6:5 हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर की विजय अक्सर अप्रत्याशित मार्गों से आती है—आज्ञापालन, अनुशासन और सामूहिक विश्वास के संयोजन से। दीवारें तब गिरती हैं जब ईश्वर की इच्छा और उसकी जाति का लोगों का समर्पण एक साथ चलते हैं। यह श्लोक व्यक्तिगत और सामुदायिक जीवन में धैर्य, आज्ञा और भरोसे का व्यवहारिक पाठ देता है।