Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 11:1 मत्ती 11:2 मत्ती 11:3 मत्ती 11:4 मत्ती 11:5 मत्ती 11:6 मत्ती 11:7 मत्ती 11:8 मत्ती 11:9 मत्ती 11:10 मत्ती 11:11 मत्ती 11:12 मत्ती 11:13 मत्ती 11:14 मत्ती 11:15 मत्ती 11:16 मत्ती 11:17 मत्ती 11:18 मत्ती 11:19 मत्ती 11:20 मत्ती 11:21 मत्ती 11:22 मत्ती 11:23 मत्ती 11:24 मत्ती 11:25 मत्ती 11:26 मत्ती 11:27 मत्ती 11:28 मत्ती 11:29 मत्ती 11:30



मुख्य अर्थ
यीशु का यह वचन—"हाय, खुराजीन! हाय, बैतसैदा!"—न सिर्फ उस स्थानों पर प्रक्रियात्मक निन्दा है जहाँ चमत्कार हुए, बल्कि वह हृदय की कठोरता और पश्चात्ताप की कमी पर तीव्र चेतावनी भी है। यीशु दर्शाते हैं कि प्रकाश और संकेत मिलने पर भी जब लोग विश्वास न करें तो उनकी बर्बादी गंभीर होती है।
साहित्यिक प्रसंग
यह वचन सन्देश की ऐसी श्रेणी में आता है जहाँ यीशु ने आसपास की नगरों की तुलना की है जिन्होंने उसके चमत्कार देखे। मत्ती 11 के पहले भाग में यीशु का जॉन का प्रश्न और परमेश्वर के राज्य का उद्घोष है। उसके बाद यीशु जाड़े में कायरता और कटु-आलोचना दोनों को संबोधित करता है। खुराजीन और बैतसैदा का नाम विशेष रूप से इसलिए लिया गया क्योंकि वहाँों में सामर्थ्य के चमत्कार हुए थे परन्तु लोक-उत्तरदायित्व में परिवर्तन नहीं आया।
दैवीय और नीतिगत महत्व
1) संकेत का नैतिक दायित्व: चमत्कार स्वयं में विश्वास की गारंटी नहीं देता; वे प्राथमिकी रूप से द्रष्टांतर हैं जिन्हें जवाब की जरूरत होती है।
2) अधिक प्रकाश पर अधिक जिम्मेवारी: जिन नगरों ने प्रत्यक्ष प्रमाण देखा, उनसे अपेक्षा थी कि वे गंभीर रूप से आत्म-परीक्षण और पश्चात्ताप करें; अस्वीकृति का परिणाम कठोर होगा।
3) दण्ड का स्वरूप: "टाट ओढ़कर और राख में बैठकर" का चित्र शोक और पश्चात्ताप की संस्कृति को दर्शाता—यदि वे सच्चे पश्चातापी होते तो वे तुरंत बदल जाते।
शास्त्रों के साथ संबंध
विचारणीय प्रश्न
- क्या मैं उन संकेतों और अवसरों को पहचानता/पहचानती हूँ जो मुझे परिवर्तन के लिए दिए जाते हैं?
- किस प्रकार मेरी प्रतिक्रिया प्रकाश के आने पर मेरे आध्यात्मिक परिमाण को दर्शाती है?
- क्या मैं लोगों को चिह्नों के कारण नापसंद करने के बजाय उनकी आत्मा के प्रति निःस्वार्थ देखभाल कर पा रहा/रही हूँ?
पुरानी टिप्पणियों से संक्षेप
मैथ्यू हेनरी का सर्वथा सार यह है कि चमत्कार देखने पर भी जब मन परिवर्तित न हो तो यह बड़ा दोष है; "यदि वे सोर और सीदोन में किए जाते..." जैसा उनका तर्क बतलाता है कि अधिक अवसर पर अधिक दण्ड सम्भव है। अल्बर्ट बार्न्स ने भी इस स्थान पर जोर दिया कि यीशु का भाष्य दंड और चेतावनी दोनों है—चमत्कार का उद्देश्य विश्वास उत्पन्न करना था पर उसके परिणाम अनियंत्रित रहे। एडम क्लार्क ने नगरों के सामाजिक-धार्मिक उत्तरदायित्व पर टिप्पणी करते हुए कहा कि चिह्नों को देखकर भी नहीं बदलना कठोरता की गंभीरता दिखाता है। (उपरोक्त टीकों से केवल संक्षिप्त सारांश लिया गया है; किसी का शब्दशः उद्धरण यहाँ नहीं दिया गया।)
निष्कर्ष
मत्ती 11:21 हमें चेतावनी देता है कि ईश्वीय प्रकाश मिलने पर निष्क्रिय रहना आत्मिक विनाश को आमंत्रित कर सकता है। परमेश्वर के संकेतों और सेवक के साक्ष्य पर हमारी जागरूकता और उत्तरदायित्व अधिक होता है। यह पद व्यक्तिगत आत्मनिरीक्षण और समुदाय में जिम्मेदारी दोनों का आमंत्रण है—प्रकाश मिलने पर परिवर्तन आवश्यक है।