Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 11:1 मत्ती 11:2 मत्ती 11:3 मत्ती 11:4 मत्ती 11:5 मत्ती 11:6 मत्ती 11:7 मत्ती 11:8 मत्ती 11:9 मत्ती 11:10 मत्ती 11:11 मत्ती 11:12 मत्ती 11:13 मत्ती 11:14 मत्ती 11:15 मत्ती 11:16 मत्ती 11:17 मत्ती 11:18 मत्ती 11:19 मत्ती 11:20 मत्ती 11:21 मत्ती 11:22 मत्ती 11:23 मत्ती 11:24 मत्ती 11:25 मत्ती 11:26 मत्ती 11:27 मत्ती 11:28 मत्ती 11:29 मत्ती 11:30



परिचयात्मक अवलोकन
यह पद मत्ती 11 में उन दो प्रतिकूल प्रतिक्रियाों के सन्दर्भ में आता है—यूहन्ना का जीवन और यीशु की आतिथ्य-व्यवहार। यूहन्ना बपतिस्त ने वैध तप और फलीभूत चेतना के साथ धर्मी जीवन जीया, जबकि यीशु के समय के लोग उसे दुष्टात्मा कहकर चकित कर देते थे। इस वाक्य में यीशु स्पष्ट करते हैं कि उनका संदेश और व्यवहार दोनो विपरीत प्रकार के प्रतीकों के बावजूद ईश्वर की योजना के अनुरूप है।
कथन का पाठ-संदर्भ
मत्ती 11 में यीशु यूहन्ना का संदर्भ लेकर यह स्पष्ट करते हैं कि दुष्टात्मा की दलीलों के बजाय वास्तविकता यह है कि ईश्वर के राज्य की वास्तविकता एक साथ उभरती है—तप और निर्भीकता के साथ बुलाए गए पवित्र जीवन के साथ।
मुख्य संदेश
इस पद का केंद्रीय विचार यह है कि ईश्वर के राज्य की दृष्टि विविध चरित्रों के साथ संचालित होती है: यूहन्ना ने कठोर उपदेश और तपस्या से धर्म को उद्धार के रास्ते पर रखा, जबकि लोग उसे दुष्टात्मा कहकर उपहास करते हैं। यीशु संकेत कर रहे हैं कि धर्मी जीवन के दो आयाम—विधेय और आशीर्वाद—हमें एक दूसरे से जुदा नहीं करते; बल्कि वे अलग-अलग प्रतीकों के साथ ईश्वर की कृपा को दर्शाते हैं।
महत्वपूर्ण सीख
पुनःपाठ और तुलनात्मक संदर्भ
येक ही विचार 1 कुरिन्थियों 1:23–25 में भी मिलता है—जो लोग मसीह को क्रॉस के दोष के रूप में देखते हैं, वे नहीं समझ पाते, परंतु ईश्वर की शक्ति निर्गम है। साथ ही लूका 7:33–35 में यूहन्ना और यीशु के विरोधाभासों के बावजूद प्रभु का संदेश “आस्था से” लिया जाता है।
आचरण के लिए अनुप्रयोग
हम किस प्रकार ईश्वर के राज्य के संकेतों को पहचानें? जीवन के विविध आयामों—नैतिक कठोरता और प्रेमपूर्ण सहृदयता—के बीच संतुलन बनाकर चलना सीखें। सामाजिक आलोचनाओं के बीच भी सत्य और नैतिकता से डटना चाहिए, किंतु नम्रता और करूणा से सेवा करना चाहिए।
संक्षेप
मत्ती 11:18 यह स्मरण कराता है कि धर्म के दो भिन्न रूप—यूहन्ना की कठोर तपस्या और यीशु के आशीर्वादपूर्ण संदेश—ईश्वर के राज्य के अभिव्यंजन हैं। लोग यदि दुराग्रह से देखते हैं, तब भी परमेश्वर का कार्य आगे बढ़ता है।
क्रॉस-रेफरेंसेज और संक्षिप्त स्पष्टीकरण
1) मत्ती 9:14–15—यीशु कहता है कि पुरानी रीति के साथ नया आनंद नहीं मिल सकता; परन्तु ईश्वर की कृपा से नया जीवन आता है।
2) लूका 7:33–35—यूहन्ना और यीशु के मिश्रित संकेतों के बीच लोगों की प्रतिक्रिया स्पष्ट होती है कि ईश्वर की योजना कैसे मानवीय प्रतिक्रियाओं से परे है।
3) 1 कुरिन्थियों 1:23–25—कृष्ण मसीह को क्रॉस के रूप में देखने वालों के लिए यह तर्क कि ईश्वर की बुद्धि दिखाने में शक्ति है, हमारे विश्वास की आधारशिला है।
यद्यपि प्रत्यक्ष उद्धरण में शॉर्ट-फॉर्म के लिए कुछ व्याख्या बरकरार है, ऊपर के हिस्सों में सुझावित पात्र उद्धरण-रेखा केवल संदर्भ हेतु है और पूर्ण पाठ उद्धृत नहीं है।