Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीतिवचन 15:5 — सरल शब्दों में अर्थ
इस पद का सीधे मतलब है: मूर्ख अपने पिता की शिक्षा का तिरस्कार करता है, परन्तु जो डाँट को मानता है, वह विवेकी हो जाता है। डाँट या सुधार को मान लेने वाला व्यक्ति बुद्धिमान मना जाता है, क्योंकि वह कठिन रास्तों के बजाय सीखने और सुधार की प्रक्रिया को स्वीकार करता है।
संदर्भिक पृष्ठभूमि
नीतिवचन लेखक जीवन के व्यवहार और नैतिक सीखों को सरल, स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करते हैं। यहाँ पिता-शिक्षा एक संकेत है समाज में संस्थागत या पारिवारिक मार्गदर्शन का—उनका उद्देश्य युवा को गलतियों से बचाने और जीवन के छोटे-बड़े निर्णयों में बुद्धिमानी दिखाने में मदद करना है। डाँट एक चमत्कारिक रूप से नहीं, बल्कि चिंता, प्रेम और जिम्मेदारी का व्यक्त रूप है, जो व्यक्ति को अपने व्यवहार की समीक्षा करने के लिए प्रेरित करता है।
व्याख्यात्मक अवलोकन
थीमेटिक सार
क्रॉस-रेफरेंसेज (संदर्भ)
1) नीतिशास्त्र के अन्य स्थल भी यह दिखाते हैं कि सुधार को ग्रहण करना बुद्धिमानी है; वहां पिता-पालन या गुरु-आशीर्वाद के प्रति खुलापन व्यक्ति के विकास में सहायता करता है.
2) शिक्षा के मूल्य पर जोर देने वाले अन्य बाइबिल संदेश भी प्रमुख है कि शिक्षा और अनुशासन का संतुलन मानव जीवन को दिशा देता है, न कि केवल कठोरता।
3) आत्म-निरीक्षण और परिवर्तन के सिद्धांत से जुड़ा उदाहरण: गलतियों से सीखना और उसे सुधारना चरित्री बनाता है।
व्यावहारिक निष्कर्ष
अपने भीतर डाँट और सुधार के लिए ग्रहणशीलता विकसित करें। आलोचना से चिढ़ना नहीं, बल्कि उसे मार्गदर्शन—सीखने और सुधरने का अवसर—कहकर अपनाएं। माता-पिता या गुरुओं के अनुभवों से सीखना जीवन के कठिन निर्णयों में विवेक लाता है।
एतिहासिक-प्रयोगात्मक नोट
ईश्वर के भय और आचरण के प्रति यह नैतिक निर्देश परिवार में संयम और सम्मान के मूल्यों को प्रबल करता है, जो समाज में स्थिरता और सद्भाव बनाये रखने में सहायक होते हैं।
कथा-सार
सार यह है कि डाँट या आलोचना को नकारना मूर्खतापूर्ण है, जबकि उसे समझकर अपनाना और सुधार की दिशा में कदम बढ़ाना विवेक का परिचायक है।