Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीतिवचन 19:25 का सार: ठट्ठा करनेवाला पर चोट, भोला समझदार बनते हैं; डाँटे जाने पर समझदार अधिक ज्ञान पाते हैं
इस पद के अनुसार, हँसी-ठट्ठा या उपहास करने वाले के प्रति क्रिया-विधि से शिक्षा मिलती है। चुनी हुई कठोरता, या सख्त शब्दों के द्वारा भी गलतियों पर उचित ध्यान दिया जाता है, ताकि भोले व्यक्ति सचेत और समझदार बने। साथ ही, जो ठट्ठे में शामिल रहते हैं, वे सीखने से वंचित रहते हैं और समयानुसार सुधरते नहीं दिखते। नीतिगत जीवन के लिए यह संकेत देता है कि आचरण में सतर्कता और सही नेतृत्व की आवश्यकता है; आंतरिक समझ तब विकसित होती है जब दण्ड या डाँट से अनुशासन मिलता है।
पार्श्वभूमि और संदर्भ
नीतिवचन एक बुद्धिमत्ता-प्रधान साहित्य है जो नैतिक जीवन के मार्गदर्शन के लिए बनता है। यहाँ “ठट्ठा” से आशय उन लोगो से है जो विनम्रता के बिना दूसरों को हँसाते हैं या आलोचना के बिना सच की राह से भटकाने का प्रयास करते हैं। समाज में ऐसे व्यवहार से गलत आचरण पनपते हैं, जबकि डाँट या नसीहत से सत्य और सावधानी बढ़ती है।
interpretación के महत्वपूर्ण बिंदु
संगत आयतों के साथ संक्षिप्त संबंध
1) प्रयत्नपूर्वक आचरण सुधार: गलत कार्य पर निंदा और सही मार्गदर्शन से व्यक्ति अपने मार्ग पर लौट सकता है। (नीतिवचन 15:12, 17:10)
2) नम्रता और समझदारी: विनम्रता से सीखना और दुसरों के मूल्य को समझना ज्ञान बढ़ाता है। (नीतिवचन 11:2; कर्म 17:11)
3) दया और सच बोलना: कठोरता के साथ भी प्रेमपूर्ण सुधार से शुद्धता आती है। (गलातियों 6:1; याकूब 3:17)
संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष
जो ठट्ठे में फँसाकर दूसरों को हँसाते हैं, उन्हें सचेत किया जाना चाहिए ताकि वे अपनी मानवीय पहलुओं को पहचानें और बेहतर बनें। वहीं जो आलोचना को स्वीकार कर लेते हैं, वे बुद्धिमानी और ज्ञान की दिशा में तेज़ी से बढ़ते हैं। इसने शिक्षा का लक्ष्य स्पष्ट किया है: दण्ड-नसीहत से गलतियों को सुधारना, न कि केवल आक्रोश व्यक्त करना।
अनुशासन, ज्ञान और बचाव
नीतिवचन के इस वाक्य से हम यह सीखते हैं कि सही आचरण और सकारात्मक परिवर्तन के लिए अनुशासन जरूरी है। ठट्ठे से बचना और आलोचना को स्वीकार कर सीखना, दोनों मिलकर व्यक्ति को अधिक गहरे ज्ञान और विवेक तक पहुँचाते हैं।
उद्धृत संकेत (महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ)
यहाँ आवश्यकतानुसार पाठकगण को प्रमुख पुरानी टिप्पणीकारों के भाष्यों के शब्दों के छोटे उद्धरण नहीं दिए गए हैं ताकि मूल सन्देश स्पष्ट रहे। किन्तु Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के विचारों में यह सामान्य धारणा है कि अनुशासन और सचेतनापूर्ण आलोचना से आत्म-विकास संभव होता है; आप चाहें तो उनके संकलनों में नीतिवचन के समान पदों के संदर्भ देख सकते हैं।
क्रॉस-रेफरंस (संक्षेप)
नीतिवचन 15:12 – समझदार लोगों से अस्वीकृति मिलती है; क्रोध नहीं।
नीतिवचन 11:2 – विनम्रता ज्ञान लाती है; घमंड से असफलता।
याकूब 1:19–20 – धीरे-धीरे सुनना, जल्द बोलना और क्रोध से दूर रहना, ज्ञान को प्रकट करता है।