Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीतिवचन 19:3 का अर्थ
यह वचन बताता है कि व्यक्ति अपनी मूर्खताओं के कारण ही अपने मार्ग को गलत बनाता है और अंततः यहोवा के विरुद्ध अपने मन में अभिमान या चिढ़ पैदा कर लेता है। सरल शब्दों में: आपकी निर्बोध-सी मानवीय गलतियाँ ही आपके दुखों का कारण बनती हैं, और आप अपने निर्णयों की जिम्मेदारी से भागते नहीं हैं बल्कि परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध अपनी धारणाओं को मजबूती देते हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
नीतिवचन में विरक्ति-युक्त कर्म और व्यवहार के पीछे की सोच को बार-बार उद्घाटित किया गया है—क्योंकि नीति और बुद्धि के बिना चलना जीवन को कठिन बनाता है। यहाँ कहा गया है कि मूर्खता के कारण मनुष्य का मार्ग टेढ़ा होता है, अर्थात् उसकी योजना, निर्णय और आचरण त्रुटिपूर्ण रहते हैं। निष्कर्षतः, मूर्खता से वह यहोवा से चिढ़ने लगता है—अपनी गलतीयों से मुँह मोड़कर परमेश्वर की सत्ता और मार्ग को अनदेखा करना, अंततः मानसिक और नैतिक दूरी बढ़ाता है।
व्याख्या के मुख्य बिंदु
पवित्र-ग्रंथ के अन्य सन्दर्भ से सम्बन्ध
– नीतिगत सत्य की पुष्टि के लिए अन्य वचनों से यह समझ में आता है कि दुष्ट मनोवृत्ति मार्ग को बाधित करती है (उदा. नीतिफ, 14:12; 16:25) — इनमें भी स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य के निर्णयों का आस्था से बंधना कितना आवश्यक है।
– विवेक और आत्म-नियंत्रण की महत्ता: आपत्ति के समय भी विवेकपूर्ण व्यवहार से मार्ग सुरक्षित रहते हैं (उदा. नीतिशतक 3:5-6).
छोटी थीमैटिक सूची
प्रमुख विचारधारा और अनुवादक उद्धरण
यह पाठ मू कांग्रेसित करता है कि व्यक्ति की हठधर्मी और अनिश्चय ही उसकी नैतिक और आध्यात्मिक दिशा को प्रभावित करती है। समान्य तौर पर, व्याख्याताओं के अनुसार मूर्खता एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने मार्ग के वेग को अपने विवेक के बाहर बतला देता है, जिससे वह खुद अपनी गति को बाधित करता है।
यदि आप चाहें, तो आप Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डायरे संदर्भ टिप्पणियों से अनुरूप सूचनाओं को देख सकते हैं; यहाँ संक्षेप में उनके सामान्य निष्कर्ष हैं: उनके अनुसार यह वचन मानवीय विवेक की कमी को स्पष्ट करता है और यह बताता है कि परमेश्वर के प्रभाव से विचलन प्रायः आत्म-ग़लतफहमी का परिणाम होता है। (नोट: नीचे 3 टिप्पणीकारों के सामान्य निष्कर्षों के संकेत दिए जाते हैं, पूर्ण उद्धरण जगह-स्थान के बजाय संकेतन रूप में हैं।)
संक्षेपित व्यावहारिक निष्कर्ष
– निर्णयों में विवेक-युक्त मार्ग अपनाएँ; मूर्खता के कारण होने वाले परिणामों को स्वीकार करें।
– यहोवा की योजना के अनुरूप चलना ही शांति का मार्ग है, न कि अहंकार के साथ संघर्ष।
अनुबंधित क्रॉस-रेफरेंसेस
इस पाठ से गूढ़ शिक्षा यही निकलती है कि आत्म-निर्भरता की जगह परमेश्वर की शिक्षा पर निर्भरता ही जीवन के मार्ग को सही और सुरक्षित बनाती है।