Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीति-वचन 24:17 — दुष्ट के पतन पर आनंद न करें
इस श्लोक का सीधा संदेश है: जब आपका शत्रु गिर जाए या उसे तवज्जो में चोट लगे, तो आप प्रसन्न न हों और मन मग्न न करें। परमेश्वर की दृष्टि में विपत्ति में पड़े व्यक्ति के प्रति सम्मान और दूसरों के नुकसान पर निश्चल हर्ष नहीं होना चाहिए।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
नीतिवचन यह सूचित करते हैं कि जीवन के व्यवहारिक नियम ईमानदार, विवेकपूर्ण और दयालु होने चाहिए। यहाँ კონ텍्स्ट में शत्रुओं के प्रति क्रोध या पागलपनपूर्ण हर्ष को रोकना है, ताकि नैतिक स्थिरता बनी रहे। कहे गए शब्द, “जब वह ठोकर खाए,” से संकेत मिलता है कि शत्रु के दुर्भाग्य पर असामाजिक या अत्यधिक आलोचनात्मक रवैया अनुचित है। यह शॉर्ट-ड्यूटी या बदला लेने की प्रवृत्ति पर नैतिक चेतावनी भी है।
व्याख्यात्मक बिंदु
धार्मिक साहित्य से संबद्ध विचार
यहां के समान विचार कई स्थानों पर मिलते हैं जहाँ विपत्ति में भी दूसरों के प्रति दया और संतुलित मनोभाव बनाए रखने की शिक्षा दी जाती है।
संदर्भ-सम्बन्ध: - रोजगार-स्थिति में प्रतिस्पर्धा के समय भी दयालुता बनाए रखना (उधृत विचार) — यह दिखाता है कि व्यवहारिक नैतिकता केवल क्षणिक लाभ नहीं, बल्कि चरित्र का परीक्षण है। - अन्य शास्त्रों में como पापी के पतन पर चिरस्थायी भय या संतुलन, न केवल दुर्भाग्य पर हर्ष नहीं करना चाहिए।
क्रॉस-रेफरेंसेज़ (सूक्ष्म संदर्भ)
इन संदर्भों के जरिए दिखता है कि शत्रु के पतन पर खुशी पाना हमारी आंतरिक शांति और नैतिक साधना के विरुद्ध है; वरन् धैर्य और न्याय का मार्ग अपनाने में ही सच्ची रीढ़ है।
संक्षिप्त नैतिक निष्कर्ष
ठोस निष्कर्ष
नीतिवचन 24:17 हमें स्मरण दिलाता है कि ईश्वर के चेहरے पर हमारा हृदय और हमारी प्रतिक्रियाएं मायने रखती हैं। शत्रु के पतन पर भी संतुलित, दयालु और नम्र रहना ही धर्मी जीवन का परीक्षण है, जिससे समाज में सचेत प्रेम और न्याय की धारा मजबूत होती है।
कठोर परन्तु संतुलित निर्देशों के साथ, यह श्लोक हमें बताता है कि शत्रु की स्थिति पर हाम्रो आचरण कैसे होना चाहिए: बिना आपत्ति के, बिना क्रोध के, और उनके लिए बेहतर के लिए प्रार्थना की दिशा में कदम बढ़ाना।