Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
नीतिवचन 17:1 नीतिवचन 17:2 नीतिवचन 17:3 नीतिवचन 17:4 नीतिवचन 17:5 नीतिवचन 17:6 नीतिवचन 17:7 नीतिवचन 17:8 नीतिवचन 17:9 नीतिवचन 17:10 नीतिवचन 17:11 नीतिवचन 17:12 नीतिवचन 17:13 नीतिवचन 17:14 नीतिवचन 17:15 नीतिवचन 17:16 नीतिवचन 17:17 नीतिवचन 17:18 नीतिवचन 17:19 नीतिवचन 17:20 नीतिवचन 17:21 नीतिवचन 17:22 नीतिवचन 17:23 नीतिवचन 17:24 नीतिवचन 17:25 नीतिवचन 17:26 नीतिवचन 17:27 नीतिवचन 17:28



नीतिवचन 17:5 — उपहास और द्रवित क्रिया की निंदा
जो निर्धन को उपहास में उड़ाता है, वह उसके कर्त्ता की निन्दा करता है; और जो किसी की विपत्ति पर हँसता है, वह निर्दोष नहीं ठहरेगा।
संदर्भगत पृष्ठभूमि और टेक्स्ट का विश्लेषण
यह वाक्य, नीतिवचन की नीति-विद्या से जुड़ी है जिसमें नीतिशास्त्र के अनुसार चरित्र-गुण, न्याय और समाजिक जीवन के मूल्यों की स्थापना की जाती है। यहां प्रभा (उपहास) और विपत्ति पर हँसी—दोनों प्रकार के नैतिक गुणों की जाँच करते हैं। यहूदी समाज में निर्धनता एक व्यापक मुद्दा थी; इसलिए उपहास करना और विपत्ति पर हँसना स्वार्थी, असंवेदनशील और अन्यायपूर्ण आचरण माना गया। इस पाठ से यह स्पष्ट है कि परमेश्वर सत्य के साथ है और वह सामाजिक दुर्व्यवहार को देखता है।
पवन-विश्वास और ईश्वर की दृष्टि
कथन यह दिखाता है कि ईश्वर गम्भीर तौर पर सामाजिक अन्याय के विरुद्ध है। जो शोषण या तिरस्कार के साथ कमजोर वर्ग को दबाते हैं, वे अपने कर्मों के परिणाम से बच नहीं पाएंगे। प्रभु का मानवीय दया और न्याय का स्वरुप यहाँ स्पष्ट है: न तो निर्धन की उपहास को सहन किया जाना चाहिए और न ही विपत्ति पर हँसी-ठहाका।
महत्त्वपूर्ण शब्द और चित्रण स्पष्ट करना
- उपहास: निर्बल के ऊपर तंज या चिढ़ diagnosing; इसकी क्रूरता मूकदर्द को बढ़ाती है।
- निर्धन: आर्थिक रूप से कमजोर लोग, परनिष्ठ नहीं—परन्तु समाज में उनकी स्थिति का दुरुपयोग निष्प्रभाव नहीं है।
- निन्दा: हर वह क्रिया जो पाप-शीलता को दिखाती है, ईश्वर के सामने दोष-आक्षेप के समान है।
संयुक्त मार्गदर्शक विचार: अन्य प्रमुख टिप्पणीकारों के हल्के संकेत
– एडम क्लार्क और मैथ्यू हेनरी के विचारों के आधार पर यह समझ आती है कि उपहास से निर्धन के साथ अन्याय बढ़ता है; नैतिकता का मूल है प्रेम और दया। यह भी कहा गया है कि सत्य-न्याय के बिना सामजिक शान्ति अस्थिर होती है।
सीधी क्रॉस-रेफरेंसेस और उनका संक्षिप्त अर्थ
इन संदर्भों में यह सिद्ध होता है कि ईश्वर सत्य और दया को सर्वोच्च मानते हैं; समाज में कमजोर की रक्षा करना परमेश्वर के काम का भाग है।
आज के संदर्भ में व्यावहारिक अनुप्रयोग
- निर्धन या कमजोर पर उपहास न करें; उनके साथ सहानुभूति रखें और सहायता करें।
- विपत्ति में भी मुस्कान या तिरस्कार के बिना सम्मानजनक व्यवहार बनाए रखें; हर किसी के दर्द को समझने की कोशिश करें।
- निजी आचरण को सुधारें: दया, करुणा और न्यायपूर्ण सोच को अपने दैनिक निर्णयों में ग्रहण करें।
निष्कर्ष
नीतिवचन 17:5 हमें यह सिखाता है कि ईश्वर उसकी नज़रों में दया और न्याय के बिना नहीं टिकती। उपहास और ठहाकों के पीछे की अन्धकारपूर्ण नैतिकता समाज को भ्रमित और नुकसान पहुँचाती है। हर व्यक्ति के लिए गरिमा, सहायता और सम्मान का व्यवहार परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है।
कथन उद्धरण (अगर उपलब्ध): मॅथ्यू हेनरी, एलेर्बार्ट बार्न्स, एडम क्लार्क के कुछ विचारों के संक्षिप्त सार को यहाँ समाहित किया गया है; उनके विशिष्ट वाक्यों के पूर्ण उद्धरण नीचे नहीं दिए गए हैं—केवल इस पाठ में प्रयुक्त विचारों के संदर्भ के रूप में उल्लेखित हैं:
“उपहास का तीर निर्धन के लिए अत्यंत आहत करने वाला है।” (सार)