Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
नीतिवचन 17:1 नीतिवचन 17:2 नीतिवचन 17:3 नीतिवचन 17:4 नीतिवचन 17:5 नीतिवचन 17:6 नीतिवचन 17:7 नीतिवचन 17:8 नीतिवचन 17:9 नीतिवचन 17:10 नीतिवचन 17:11 नीतिवचन 17:12 नीतिवचन 17:13 नीतिवचन 17:14 नीतिवचन 17:15 नीतिवचन 17:16 नीतिवचन 17:17 नीतिवचन 17:18 नीतिवचन 17:19 नीतिवचन 17:20 नीतिवचन 17:21 नीतिवचन 17:22 नीतिवचन 17:23 नीतिवचन 17:24 नीतिवचन 17:25 नीतिवचन 17:26 नीतिवचन 17:27 नीतिवचन 17:28



नीतिवचन 17:12 पर एक नज़र: मूर्ति से भरे विचार बनाम मूर्खता का सामना
नीतिवचन 17:12 में पाठक को चेतावनी दी जाती है कि जो प्रत्यक्ष खतरे या न होकर भी गहरा डर पैदा कर सकते हैं, वे एक मूर्ख के साथ सामंजस्य में रहने से बेहतर हैं। इसका आशय यह है कि विचारी, विवेकपूर्ण जीवन सच्चे खतरे को पहचान सकता है, जबकि मूर्ख के साथ घुलना-घुलना आत्म-जोखिम को बढ़ाता है। यहाँ भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में नीतिगत विवेक की महत्ता उभरती है।
पद का विषय-वस्तु और अध्याय-संदर्भ
यह पद वचन-शृंखला के भीतर, दैनंदिन निर्णयों में विवेक और सतर्कता के मूल्य को उजागर करता है। यह बताता है कि किस प्रकार असुरक्षित, अज्ञानी या टीका-टिप्पणियों से भरे मूर्त विचारों में फँसना, अनेकों बार वास्तविक खतरे से अधिक नुकसान पहुँचाता है। “बच्चा-छीनी-हुई-रीछनी से मिलना” यह रूपक एक तीखा आक्रोश या नकारात्मक उदाहरण हो सकता है जिसमें अचानक और असावधान मिलना नुकसानदेह हो सकता है; इसके साथ “मूर्खता में डूबे हुए मूर्ख से मिलना” एक स्पष्ट चेतावनी है कि अनुभवहीन और दुष्परिणामी विचारों के साथ मेल-जोल से बचना चाहिए।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
1) विवेक बनाम अज्ञानता: जीवन में निर्णय लेते समय विवेक, प्रायः छोटी-छोटी बातों में भी, दूरी बनाए रखना चाहिए ताकि बड़े नुकसान से बचा जा सके।
2) जोखिम का आकलन: विचलित सोच या अस्थिर मत-मतांतर से बनी भटका देने वाली स्थितियाँ शांति और सुरक्षा दोनों को खतरे में डालती हैं; सही समझबूझ से खतरे पहचानना चाहिए।
3) संतुलित संवाद: बिना सोचे-समझे किसी के साथ मेल-जोल से बचना चाहिए ताकि नकारात्मक प्रेरणाओं या मूर्खताओं के प्रभाव से बचा जा सके।
अनुरेखणीय पारस्परिक संदर्भ
- नीतिवचन 13:20: समझदार लोगों के साथ चलना सीखने का मार्ग बनाता है; अनाड़ी या मूर्खों के साथ रहने से मार्ग निकलता है।
- यिर्मयाह 6:16: पूछो और अच्छा मार्ग चुनो; वह जो विश्राम और सुरक्षा देता है उसे अपनाओ।
- मत्ती 7:6: डाले हुए मूल्यवान शब्दों को सतर्क होकर चाहिए; अनावश्यक जोखम से बचना चाहिए।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
मूल पाठक-आकर्षण के साथ एक संक्षेप
नीतिवचन 17:12 हमें एक सरल, पर गहन शिक्षा देता है: जीवन में वास्तविक खतरा तब उभरता है जब हम अज्ञानी या मूर्ख विचारों के साथ घुल मिल जाते हैं। विवेक, सावधानी और संयम ही ऐसे क्षणों में सुरक्षा के मार्ग दिखाते हैं। सच का मार्ग चुनना, चाहे वह तुरंत न दिखे, अंततः अधिक स्थायी सुरक्षा देता है।
संक्षिप्त उद्धरण (public-domain टिप्पणीकारों से)
ऐतिहासिक टिप्पणीकारों से संगत विचारों में यह समझ में आता है कि संयम और विवेक का अभाव ही सबसे बड़ा खतरा है; मूर्खता के साथ मेल-जोल अक्सर अकस्मात नुकसान तक ले जाता है। नीचे दिए गए संक्षिप्त संकेतित विचारों से प्रेरणा मिलती है:
Matthew Henry (सार): “The best safeguard is wise foresight; foolish company brings ruin.”
Albert Barnes (सार): “Avoiders of folly, in their company, are led into snares which wise men escape.”
Adam Clarke (सार): “Association with folly is a snare to the soul; prudence keeps one from such.”
नोट्स
उद्धृत तीनों वक्तव्य संकलित सार हैं; मूल शब्दकथन में भावनात्मक रिवायतों के अनुरूप संक्षेपित व्याख्या है।