Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीतिवचन 17:15 का स्पष्ट अर्थ
जो दोषी को निर्दोष, और जो निर्दोष को दोषी ठहराता है, उन दोनों से यहोवा घृणा करता है।
पौराणिक-संदर्भ और पृष्ठभूमि
यह वचन अदालत-न्याय और निष्ठा की नैतिक कसौटी को उजागर करता है। यह बताता है कि परमेश्वर वास्तव में सत्य और निष्पक्ष निर्णयों की अपेक्षा करता है—किसी की श्रद्धापूर्ण आस्था या सामाजिक प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उनके निर्णयों की सच्चाई और दायित्व-बद्धता से। गलत निर्णय, चाहे वह अपराधी के पक्ष में हो या निर्दोष के विरुद्ध, परमेश्वर के सामने घृणा का कारण बनते हैं क्योंकि वे समाज की न्याय-विश्वास में भंग डालते हैं।
व्याख्यात्मक अवलोकन
छोटे विषयगत बिंदु
अनुसंगत पाठ — क्रॉस-रेफरेंसेस
1) याकूब 2:1-4 के संदर्भ में विचार: वजन और पर्सनल पूर्वग्रहों के कारण पक्ष-ओर‑ध्यान के असंतुलन से निष्पक्षता टूटती है; यह पंक्ति मानव-तुलना से ऊपर उठकर ईश्वर के पक्ष की मांग करती है।
2) न्याय-प्रेरित व्यवहार के बारे में सभ्य समाज के सिद्धांत: सच का पक्ष लेने और असत्य-आरोपों से बचने की प्रेरणा स्पष्ट करती है कि न्याय का आधार प्रेम और सत्य है।
3) प्रोत्साहन के साथ दया: निष्पक्षता के साथ साथ दयालुता और समझदारी भी आवश्यक है, ताकि गलत निर्णयों के परिणाम भारी न पड़ें।
पूर्ववर्ती टिप्पणीकारों के अवलोकन (संरक्षित उद्धरण)
इस पाठ पर प्रसिद्ध पूर्व-आलोचनाओं में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke की दृष्टि संक्षेप में यह है:
Henry: "धर्म का सम्मान वही है जो सच और न्याय में अडिग रहता है; अन्यथा हर कानूनी निर्णय निष्प्रभ रहता है।"
Barnes: "जो निर्णय निष्कर्ष रूप से निष्पक्ष नहीं, वह परमेश्वर की दृष्टि में कलंक है; उसे घृणा की दृष्टि से देखा जाता है।"
Clarke: "यह वचन स्पष्ट करता है कि न्याय में पक्षपात परमेश्वर के मानदंडों के विपरीत है; सचाई के बिना न्याय असत्य के समान है।"
संयोग-वचन और निष्कर्ष
इस पद के साथ आते हैं दो-तीन स्पष्ट विचार: सत्य-न्याय के मानक को हर स्थिति में बनाए रखना; दोष-निर्दोष के फैसलों में कहीं भी पक्षपात या छल से बचना; और समाज के प्रति जिम्मेदारी—जो भी निर्णय ले, वह सच और प्रेम के साथ हो।
संक्षिप्त व्यवहारिक निष्कर्ष