नीतिवचन 6:29 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

जो पराई स्त्री के पास जाता है, उसकी दशा ऐसी है; वरन् जो कोई उसको छूएगा वह दण्ड से न बचेगा।

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नीतिवचन 6:29 पद-दर-पद बाइबल टीका

नीतिवचन 6:29 पर दृष्टिकोण: औरत के प्रति निष्कमिता और दण्ड

तत्व-व्याख्या का आरम्भ पाठ के तत्काल सेटिंग से होता है: नीतिवचन 6 मेंहै आगे बढ़ते संकेत मिलते हैं कि व्यवहार की चतुराई और नीति-साहित्य कैसे जीवन-व्यवहार को आकार देती है। यह पंक्ति एक चेतावनी है—पराई स्त्री के पास जाना, शक्ति-आश्रय बनना और उसके साथ भ्रटाचार दिखाना सामाजिक और नैतिक विन्यास के विरुद्ध है। यह “छूना” शब्द न सिर्फ स्पर्श को दर्शाता है, बल्कि उस संबंध की सीमा और जिम्मेदारी को भी स्पष्ट करता है।

पाठ से ईश्वर की प्रकृति और विश्वास पर क्या ध्वनि मिलती है

यह अंश यह संकेत देता है कि भय और वचन-निष्ठा के बिना सुखस्थ जीवन कठिन है। नीति-ग्रहण में ईश्वर की व्यवस्था सामाजिक व्यवस्था के भीतर पवित्रता की आवश्यकता बताती है—क्योंकि गलत संगत से मनुष्य अपने आंतरिक विश्वास और ईमानदारी को जोखिम में डाल देता है। अंश यह भी दर्शाता है कि परमेश्वर के नियम अस्थिर desires के विरुद्ध एक स्पष्ट सुरक्षा-प्रणाली हैं, जिसके भीतर जीवन का नैतिक ढांचा सुरक्षित रहता है।

महत्वपूर्ण शब्द और छवि

  • पराई स्त्री के पास जाना—यह स्थायित्व और सम्मान की सीमा लांघना है; तब यह एक स्पष्ट नैतिक चेतावनी बन जाती है, क्योंकि विवाह-बंधन और निष्कपट जीवन के विरुद्ध है।
  • दण्ड से न बचेगा—यह एक चेतावनी है कि ईश्वर की व्यवस्था के विरुद्ध किसी की चेष्टा स्वतः परिणामों को जन्म देती है; दायित्व-विवेक से पलटकर भी परित्याग नहीं मिलता।

Related passages (संक्षेप में)

1) सार्वजनिक क्रम और पवित्रता के बारे में अन्य शिक्षाएँ: जो व्यक्ति पाप को छिपाता है, उसे उजागर किया जा सकता है; सत्य और आत्म-संयम से जीवन में स्थिरता आती है।

2) विवाह और ईमानदार संबंधों की महत्ता दर्शाने वाले मंगल-पथ: पवित्र संबंधों की रक्षा करने से जीवन में स्थिरता और शांति मिलती है।

3) समान विषय पर अन्य नीतियों में संयम और आत्म-नियन्त्रण का महत्त्व स्पष्ट होता है।

Cross-references और उनके छोटे स्पष्टीकरण

  • नीतिवचन 5:15-20 — विश्वसनीय प्रेम और सीमाओं के भीतर जीवन की सुरक्षा। इसका संकेत है कि निष्कपट और ईमानदार संबंध ही स्थायित्व देते हैं।
  • यहोशू 23:6-8 — परमेश्वर के नियमों के प्रति दृढ़ता और दुनिया की राहों से अलग रहने की आवश्यकता।
  • मत्ती 5:28 — दिल की इच्छा भी पाप है जब वह गर्भित निर्णयों को प्रभावित करे; बाहरी क्रिया से अधिक भीतरी विचार महत्त्वपूर्ण।

आज के संदर्भ में अनुप्रयोग

1) व्यक्तिगत सीमाओं की रक्षा: संबंधों में स्पष्ट आदर्श बनाएं; किसी के साथ अवांछित संपर्क या घनिष्ठता से दूर रहें ताकि ईश्वर के नियमों के अनुसार जीवन स्थिर रहे।

2) आत्म-नियंत्रण विकसित करें: संकेत दें कि इच्छाओं पर काबू पाना कितना जरुरी है—खासकर उन परिस्थितियों में जो सामाजिक नैतिकता के विरुद्ध हो सकती हैं।

3) समाजिक संदर्भ में जिम्मेदारी: मित्र और साथी-परिवार के प्रति विश्वसनीय और नैतिक रहते हुए, ईमानदारी और पवित्रता को प्राथमिकता दें।

एतिहासिक टिप्पणी से प्रेरणा: प्रसिद्ध पवित्र-वाणी वालों ने इस प्रकार के पाठों में आत्म-संयम और सामाजिक नैतिकता की महत्ता पर बल दिया है—किंतु यहाँ हमारा ध्यान सीधे-सीधे व्यवहार के consequences पर है।

नोट: नीचे दिए गए उद्धरण में Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के सीधे छोटे कथन उपलब्ध नहीं थे; यदि विस्तृत उद्धरण चाहिए, तो मैं तात्कालिक सार्वजनिक-डायरेक्ट टिप्पणी के संकलन से छोटे उद्धरण प्रदान कर सकता/सकती हूँ।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

नीतिवचन 6:29 समानांतर पद और संबंधित वचन

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