भजन संहिता 145:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

यहोवा महान और अति स्तुति के योग्य है, और उसकी बड़ाई अगम है।

भजन संहिता 145:3 पद-दर-पद बाइबल टीका

भजन संहिता 145:3 का परिचयात्मक संदर्भ

भजन संहिता 145 एक अलौकिक मंच है जिसमें दयालु राजा Yahweh की महिमा उत्कट रूप से उभरती है। यह श्लोक, जो यीशु नहीं, बल्कि परमेश्वर की महानता और उसकी स्तुति के अनंत गुणों को उद्घाटित करता है, भजनकार द्वारा आरम्भिक वाक्य के रूप में पढ़ा जाता है कि Yahweh महान है और स्तुति के योग्य है; उसकी महिमा असीम और अगम है। यह पाठ परमेश्वर के चरित्र के व्यापक मंच का उद्घाटन करता है: वह भक्त की ओर मुख के साथ दयालु, और सर्वेश्वर है जो हर प्राणी के साथ संलग्न रहता है।

पवित्रता, महानता और स्तुति

यह श्लोक तीन प्रमुख गुण पेश करता है: महानता, स्तुति के योग्य होना, और उसकी बड़ाई की असीमता। यह देवत्व की सच्ची परम सत्ता और आस्था के केंद्र को रेखांकित करता है—कि हमारा परमेश्वर अकल्पनीय है, जिसकी महिमा मनुष्य के लिए अतिरेकी और पूरक है। kutenMatthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke आदि के पारंपरिक टीकाओं की अनुभूतियाँ इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि परमेश्वर की महानता मानवीय शब्दों से परे है, और उसका महिमामंडन हर संभव ध्वनि में किया जाना चाहिए। यह श्लोक पाठकों को ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास के स्थिर आधार पर खड़े होने का आह्वान करता है।

शब्दों का अर्थ और चित्रण

“यहोवा महान”—यह केवल विराट शक्ति नहीं है, बल्कि उसकी बुद्धिमत्ता, न्याय, दया और वचनबद्धता की व्यापक सत्ता को भी दर्शाता है। “अति स्तुति के योग्य”—स्तुति ऐसे है जो उसकी महिमा के सामने संतुष्टि और आस्था को अभिव्यक्त करती है; वह कोई साधारण देवता नहीं, बल्कि विश्व-निर्माता और पालनहार है। “बड़ाई अगम है”—उसकी greatness अस्तित्व की सीमाओं से परे है; हम उसे पूरी तरह समझ नहीं पाते, पर उसकी कृपा–न्याय और साछात्कार हमेशा उपलब्ध रहते हैं।

अन्य संदर्भ और उनके लिंक

  • यशायाह 40:18-26 — परमेश्वर की incomparable महिमा और उसके सृष्टिकर्ता स्वरूप का चित्रण; यह श्लोक बताता है कि भगवान के सामर्थ्य और समझ से वस्तुतः कोई तुलना नहीं।
  • भजन संहिता 150:2 — परमस्तुति का कारण परमेश्वर की शक्तिशाली और महान कृपा की महिमा को उद्घाटित करना।
  • रोमियों 11:33 — उसकी गहरी कार्य-योजना और अज्ञान की सीमा को दर्शाता है; यह जयजयकार की तख्ते पर नहीं, बल्कि विश्वास की गहराई में झुकाव का आह्वान है।

इन छंदों से स्पष्ट होता है कि ईश्वर के गुणों को समझना पूरी तरह से संभव नहीं, परन्तु उसकी महिमा को स्वीकारना और उसकी स्तुति में सहभागिता करना हमारा दायित्व है।

आज के संदर्भ में आवेदन

- विश्वास की पहली प्रतिक्रिया: जब जीवन में कठिनाई और अज्ञात स्थिति आती है, तब भी Yahweh की महानता के स्मरण से मन में स्थिरता बनती है।

- प्राथना और आराधना: हर दिन की शुरुआत और समाप्ति में उसकी महिमा की जयकार करें; यह आंतरिक शांति और आत्म-विश्वास को बढ़ाता है।

- नैतिक जीवन का मार्गदर्शन: उसकी बड़ाई का केंद्र उसकी निष्काम दया, न्याय और बंधन-रहित प्रेम है; इन गुणों को अपने व्यवहार में उतारना चाहिए।

कथनात्मक अंतर्दृष्टि—संयोजन

मध्य-आलंबन यह है कि परमेश्वर की महानता और उसकी उपस्थिति हर मानवीय कल्पना से ऊपर है। Matthew Henry के अनुसार, परमेश्वर की महिमा मानव-तत्वों से परे है और उसका कार्य सभी जीवन में प्रभुत्व बनाए रहता है; Albert Barnes इसे इस तरह देखते हैं कि भगवान की महत्ता और उनकी स्तुति के योग्यता में किसी प्रकार की सीमा नहीं। Adam Clarke भी यह मानते हैं कि परमेश्वर की बड़ाई असीम है और इंसानी समझ से बाहरी है। इस प्रकार, एक समेकित टिप्पणी के रूप में—परमेश्वर की महानता को स्वीकारना, उसकी स्तुति करना, और उसकी असीम बड़ाई पर निर्भर रहना हमारे जीवन की सांस बन जाती है।

याद रखें: यह श्लोक एक उद्घाटन है—हमारा विश्वास उसी स्रोत की महिमा से जीवित रहता है जिसकी महानता असीम है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

भजन संहिता 145:3 समानांतर पद और संबंधित वचन

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