भजन संहिता 85:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

क्या तू हम पर सदा कोपित रहेगा? क्या तू पीढ़ी से पीढ़ी तक कोप करता रहेगा?

भजन संहिता 85:5 पद-दर-पद बाइबल टीका

पाठ का परिचय

भजन संहिता 85:5 में प्रश्न रूप में पुकार दिखाई देता है: "क्या तू हम पर सदा कोपित रहेगा? क्या तू पीढ़ी से पीढ़ी तक कोप करता रहेगा?" (HINIRV)। यह शोक और आशा का मिश्रित स्वर है—लेखक परमेश्वर के न्याय और दया के बीच सम्बन्ध पर चिंतन कर रहा है। यह श्लेषात्मक प्रश्न ईश्वरीय क्रोध की अवधि और परमेश्वर के अनुग्रह की प्रत्याशा पर केंद्रित है।

अध्याय में यह पद कहां बैठता है

अध्याय 85 सामूहिक प्रत्याशा और प्रार्थना का भजन है जिसमें मन की तरस और परमेश्वर के अनुग्रह की चाह व्यक्त होती है। पूरा भजन पूर्व में बीते संकट और वापस आकर दी गयी शांति का स्मरण कराता है और आगे के लिए कृपा की याचना करता है। छठा पद (यहां 5वाँ पद HINIRV के क्रमानुसार) विशेष रूप से दण्ड की निरंतरता के भय को संबोधित करता—क्या परमेश्वर की नाराजगी स्थायी है या वह मोक्ष और क्षमा प्रदान करेगा।

मुख्य आध्यात्मिक पाठ

इस पंक्ति का मूल पाठक को यह सिखाता है कि ईमानदारी से प्रश्न करना भी आध्यात्मिक जीवन का हिस्सा है—हम अपनी दु:ख भरी स्थिति में परमेश्वर से सत्य की अपेक्षा रखते हैं। यह कथन दो महत्वपूर्ण विचार लाता है: (1) मानव का भय—परमेश्वर के दण्ड के स्थायी होने का भय; और (2) आशा—कि दया और क्षमा संभव है। यह विश्वास और निराशा के बीच एक मोड़ है जहाँ प्रार्थना और पश्चाताप द्वारा मन स्थिति में परिवर्तन आ सकता है।

संबंधित शास्त्रीय संदर्भ (क्रॉस-रेफ़रेंस)

  • भजन 30:5 — जीवन की विपत्तियों के समय में "रातभर दुख रहता है परन्तु सुबह में आनंद" जैसा विचार मिलता है; वहाँ भी क्षणिक क्रोध की तुलना स्थायी मुक्ति से की गई है।
  • यिर्मयाह 3:12–13 — परमेश्वर के पास पछतावे और वापसी का न्योता; यिर्मयाह में भी प्रश्न और अपील का स्वर पाया जाता है।
  • मरकुस 11:25 — क्षमा का व्यवहार और परमेश्वर के साथ सम्बन्ध बहाल करने की आवश्यकता; अनुग्रह की प्रत्याशा और मन की शुद्धि पर जोर।

व्याख्या और संकेत

श्री मैथ्यू हेनरी के विचारों से प्रेरणा लेते हुए कहा जा सकता है कि यह प्रश्न परमेश्वर की दया की अनुभूति को जागृत करने का प्रयोजन रखता है। मैथ्यू हेनरी ने उल्लेख किया है कि भजनकार यहाँ ईश्वर की आत्मीयता और नजदीकी की आशा जगाते हुए पूछता है कि क्या क्रोध का शासन अमर है। अल्बर्ट बार्न्स ने भी संदेह और आशा के इस मिश्रण पर विचार करते हुए कहा कि प्रश्न का आशय परमेश्वर के व्यावहारिक आचरण के परिवर्तन की आशा है। आदम क्लार्क ने प्रार्थना और पश्चाताप को दंड की समाप्ति के साधन के रूप में देखा। (यहां उपर्युक्त लेखकों के वाक्यांशों के सटीक उद्धरणों को संक्षेप में संदर्भ के रूप में लिया गया है।)

आज के समय हेतु अनुप्रयोग

व्यक्तिगत जीवन में यह पद हमें सीख देता है कि जब हम कलंक, विफलता या शास्ति का अनुभव करें तो प्रश्न करने और परमेश्वर से दया की आशा रखना दोनों स्वीकार्य और आवश्यक हैं। इससे दो व्यवहार निकलते हैं:

  • खुले दिल से प्रार्थना करें और परमेश्वर के दयालु स्वभाव पर भरोसा रखें, क्योंकि दंड का उद्देश्य ध्वंस नहीं बल्कि सुधार है।
  • पश्चाताप और व्यवहारिक परिवर्तन के द्वारा अपने सम्बन्ध को पुनःस्थापित करने का प्रयास करें; लगातार अनुनय ही अनुग्रह को आमंत्रित करता है।

संक्षेप

भजन 85:5 की पुकार हमें याद दिलाती है कि परमेश्वर का क्रोध यदि दिखे भी तो वह अक्सर सीमित और सुधारात्मक होता है; स्थायी कोपिता की धारणा बाइबिल विरोधाभासी है। यह पद आशा और याचना का द्वंद्व दर्शाता है और विश्वासियों को प्रार्थना, पश्चाताप और दया की अपेक्षा की ओर बुलाता है। अंततः पाठ हमें सक्रिय विश्वास और नम्रता द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह के स्वागत की प्रेरणा देता है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

भजन संहिता 85:5 समानांतर पद और संबंधित वचन

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