Old Testament
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सपन्याह 1:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
वह रोष का दिन होगा, वह संकट और सकेती का दिन वह उजाड़ और विनाश का दिन, वह अंधेर और घोर अंधकार का दिन* वह बादल और काली घटा का दिन होगा।
सपन्याह 1:15 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
सपन्याह 1:15 समानांतर पद और संबंधित वचन
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योएल 2:2 (HINIRV) »
वह अंधकार और अंधेरे का दिन है, वह बादलों का दिन है और अंधियारे के समान फैलता है। जैसे भोर का प्रकाश पहाड़ों पर फैलता है, वैसे ही एक बड़ी और सामर्थी जाति आएगी; प्राचीनकाल में वैसी कभी न हुई, और न उसके बाद भी फिर किसी पीढ़ी में होगी। (मत्ती 24:21)

यशायाह 22:5 (HINIRV) »
क्योंकि सेनाओं के प्रभु यहोवा का ठहराया हुआ दिन होगा, जब दर्शन की तराई में कोलाहल और रौंदा जाना और बेचैनी होगी; शहरपनाह में सुरंग लगाई जाएगी और दुहाई का शब्द पहाड़ों तक पहुँचेगा।

आमोस 5:18 (HINIRV) »
हाय तुम पर, जो यहोवा के दिन की अभिलाषा करते हो! यहोवा के दिन से तुम्हारा क्या लाभ होगा? वह तो उजियाले का नहीं, अंधियारे का दिन होगा।
सपन्याह 1:15 का तात्पर्य
यह पद रोष, संकट, विनाश और अंधकार के गहन दिन की चेतावनी देता है। परमेश्वर का यह दिन अत्यंत निर्णायक और प्रसिद्ध होगा—वह दिन जब पाप का फन पूरी तरह से टूटेगा और वह ईश्वरीय न्याय का समय है।
परिप्रेक्ष्य संदर्भ
सपन्याह की पुस्तक में यरूशेलम एवं यहूदा के विरुद्ध आने वाले न्याय के संदेश को स्वर मिला है। लोग आराम केे समय में भी पापी प्रवृत्ति से दूर नहीं रहे, इसलिए भगवान की कठोर चेतावनी आती है कि वह दिन आएगा जिसमें दशा विकट होगी, सुख-दुख एक साथ होंगे और अंधकार राज्य करेगा। यह संदेश विशेषकर तब के संदर्भ में प्रचलित था जब लोग धार्मिक रीति-रिवाजों के भीतर व्यावहारिक नैतिकता से दूर हो चुके थे।
व्याख्यात्मक विचार
छोटी थीम-सूची
अन्य पवित्रग्रंथ से संबंधी संदर्भ
1) यशायाह 13:9-11 — एक ऐसी ही दिन की चेतावनी जिसमें ईश्वर की कड़ी प्रस्थान बनाम पाप की परिणति दिखती है। यह पाठ भी रोष और अंधकार के संदर्भ को स्पष्ट करता है कि न्याय के साथ संयोजित दया का दिन नहीं छूटेगा।
2) मत्ती 24:29-30 — यीशु के भविष्यसूचक प्रवचनों में अंधकार और आकाशिक आंधी-घटना से पहले साहसिक संकेत मिलते हैं, जो इस दिन के अचानक और निर्णायक स्वर को दर्शाते हैं।
3) यिर्मयाह 6:10-12 — एक समान चेतावनी जिसमें पाप के कारण नगर-निर्दोषों के लिए भी दुःख का दिन स्पष्ट है और परिवर्तन की पुकार है।
संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष
इस पाठ से सीख मिलती है कि पवित्रता, ईश्वरभक्ति और नैतिक जीवन की निरंतरता आवश्यक है। जब विश्वासित लोग पवित्रता में स्थिर रहते हैं, तब वे ऐसे दिन में भी स्थिर आशा के साथ खड़े रह सकते हैं। साथी के लिए नैतिकता और न्याय की दिशा में सचेत रहना आज भी आकर्षण है।
कठोर-परंतु-उचित उद्धरण (चयनित) और श्रद्धेय टिप्पणीकारों के संकेत
यहाँ पर Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों से स्वतंत्र और मौलिक समाकलन है। आवश्यक पर्ने छोटे उद्धरण विशेष रूप से उल्लेखित हैं:
Matthew Henry के विचारों के अनुरूप यह पद स्पष्ट करता है कि परमेश्वर का रोष पाप के प्रत्यक्ष परिणाम के साथ जुड़ा है, और यह दिन एक नये आह्वान के साथ आता है कि जनता ईश्वर के सामने पुनः तपस्या करे।
Albert Barnes के तर्कानुसार यह संदेश उपलब्धि और निर्णय के दिन का संपूर्ण संकेत है—जहाँ सामान्य जीवन के आराम के बीच पाप का परिणाम उभर कर सामने आता है और न्याय की प्रक्रिया शुरू होती है।
Adam Clarke इसे एक गहन चेतावनी के रूप में देखते हैं कि यह दिन सामाजिक-आर्थिक और धार्मिक दोनों प्रकार के अंधकार को उजागर करता है, और देव की स्थिति में परिवर्तन आवश्यक है।
संक्षेप में यह तीनों टिप्पणीकार एक बात पर मिलते हैं कि यह दिन प्रतीक है उस समय का जब पाप के कारण पृथ्वी पर कठिनाई बढ़ती है, और ईश्वर की पवित्र न्याय की लागू होने की संभावित तैयारी का संकेत देता है।
Cross-references का संक्षेप सार: यशायाह 13:9-11 — न्याय के दिन का स्पष्ट दृश्य; मत्ती 24:29-30 — भविष्य के संकेत; यिर्मयाह 6:10-12 — पाप के कारण आक्रमण और प्रतिक्रिया। इन भागों में एक सामान्य संदेश है कि पाप के समय में परिवर्तन और भक्ति की पुनःस्थापना चाहिए।