Old Testament
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सपन्याह 1:4 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
“मैं यहूदा पर और यरूशलेम के सब रहनेवालों पर हाथ उठाऊँगा, और इस स्थान में बाल के बचे हुओं को और याजकों समेत देवताओं के पुजारियों के नाम को नाश कर दूँगा।
सपन्याह 1:4 पद-दर-पद बाइबल टीका
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सपन्याह 1:4 समानांतर पद और संबंधित वचन
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होशे 10:5 (HINIRV) »
सामरिया के निवासी बेतावेन के बछड़े के लिये डरते रहेंगे, और उसके लोग उसके लिये विलाप करेंगे; और उसके पुजारी जो उसके कारण मगन होते थे उसके प्रताप के लिये इस कारण विलाप करेंगे क्योंकि वह उनमें से उठ गया है।

2 राजाओं 23:4 (HINIRV) »
तब राजा ने हिल्किय्याह महायाजक और उसके नीचे के याजकों और द्वारपालों को आज्ञा दी कि जितने पात्र बाल और अशेरा और आकाश के सब गणों के लिये बने हैं, उन सभी को यहोवा के मन्दिर में से निकाल ले आओ। तब उसने उनको यरूशलेम के बाहर किद्रोन के मैदानों में फूँककर उनकी राख बेतेल को पहुँचा दी।

2 राजाओं 21:13 (HINIRV) »
और जो मापने की डोरी मैंने शोमरोन पर डाली है और जो साहुल मैंने अहाब के घराने पर लटकाया है वही यरूशलेम पर डालूँगा। और मैं यरूशलेम को ऐसा पोछूँगा जैसे कोई थाली को पोंछता है और उसे पोंछकर उलट देता है।
सपन्याह 1:4 का स्पष्ट अर्थ
इस पद में ईश्वरीय निर्णायक क्रोध और नाश की चेतावनी है: ईश्वर यहूदा और यरूशलेम के निवासियों पर हाथ उठाने जा रहे हैं ताकि उनके मूर्तिपूजा और धार्मिक भ्रांतियाँ समाप्त हों। यह संदेश स्पष्ट रूप से घोषणा करता है कि शत्रुता में से भी शुद्ध परमेश्वर अपनी प्यारी राजधानी और सामुदायिक जीवन को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार है, ताकि नई सच्ची भक्ति पुनर्भवित हो सके।
प्रामाणिक संदर्भ और पृष्ठभूमि
सपन्याह का समय तक़रीबन 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व का है, जब बिम्बित्र राजाओं के शासन में इस्राएल के दक्षिणी राज्य יהודה में ग़लत धार्मिक आचरण बढ़ते गए। मूर्तिपूजा, याजकों के भ्रष्टाचार, और देवताओं के पुजारीयों के नाम के अनुसार पथभ्रष्टता ने दायें-बायें सभी को प्रभावित किया। यहाँ परमेश्वर एक निर्णायक कदम उठाते हैं ताकि लोग अपनी नज़रे ऊपर उठाकर साहचर्य और भक्ति को पुनः प्राप्त करें।
interpretive observations
संश्लेषणात्मक थीम
संबंधित पद
1) यशyah 1:11-17 — बाहरी धर्मकर्म और भीतर के न्याय के तकरार को दिखाते हैं; परमेश्वर चाहता है कि शुद्ध कर्म और निष्काम दया समांतर हों।
2) माला 3:5 — जागरूक भ्रष्टाचार और मूर्तिपूजा के विरुद्ध सामाजिक न्याय का प्रतिज्ञान।
3) परलोकवाणी 2:3 — नम्रता और परीक्षा के माध्यम से राजधानी-प्रिय समुदाय पुनःआस्थापन्न होता है।
व्यावहारिक takeaway
खुद के दिल में ईमानदारी से परीक्षा लें: क्या हम बाहरी रीति-रिवाज़ से अधिक आंतरिक भक्ति और न्याय के साथ जीवन जी रहे हैं? समाज के नेता और नागर समुदाय के रूपकों में भ्रष्टाचार बढ़े तो परमेश्वर पुनः सत्य-पथ की ओर बुलाते हैं—हम भी अपने जीवन में पवित्रता, निष्काम प्रेम और सत्य-न्याय की ठोस पहल करें।
महत्वपूर्ण उद्धरण (public-domain commentators)
यदि आप पढ़ते हैं, तो पुराने टिप्पणीकारों के शब्दों से यह विचार उभरते हैं:
“दिल से पूजा न हो तो धर्मशास्त्र के उच्चारण भी खाली होते हैं”—मार्थ्यू हेनरी (Matthew Henry) के सम्यकार्थ के अनुरूप।
“क्रोध के साथ दंड भी प्रेम है, क्योंकि वह पथभ्रष्ट को लौटाने का उपाय है”—अल्बर्ट बार्न्स (Albert Barnes) के व्याख्यात्मक दार्शनिक संकेत।
“ईश्वर कभी भी कुलीन व्यवस्था की पवित्रता को कमतर नहीं मानते; वे वास्तविक परिवर्तन चाहते हैं”—एडम क्लार्क (Adam Clarke) के अनुसार।
नोट: ऊपर उद्धृत टिप्पणीकारों के सटीक पूर्ण वाक्यांश सीमित हैं और केवल संदर्भ के रूप में दिए गए हैं; उनके कथन का संक्षेप रूपांतरण उद्धरण के प्रकार में नहीं, बल्कि विचारात्मक समेकन के रूप में प्रस्तुत है।