Old Testament
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सपन्याह 1:17 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
मैं मनुष्यों को संकट में डालूँगा, और वे अंधों के समान चलेंगे, क्योंकि उन्होंने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है; उनका लहू धूलि के समान, और उनका माँस विष्ठा के समान फेंक दिया जाएगा।
सपन्याह 1:17 पद-दर-पद बाइबल टीका
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सपन्याह 1:17 समानांतर पद और संबंधित वचन
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सपन्याह 1:17 का सार-भिन्नार्थ और उपयोगी विवेचन
सीधे शब्दों में अर्थ: यह वच्न कह रहा है कि यहोवा उन पर अजीब संकट और प्रलय लाएगा जो उसनेपाप किया है, वे अंधों की तरह भटकेंगे, उनके कर्महाथ का शरीर घृणा का पात्र बन जाएगा और उनके दुष्कर्म का परिणाम शुद्ध और निर्मम रूप से सामने आएगा।
पृष्ठभूमि और परिप्रेक्ष्य
सपन्याह पुस्तक एक बोध-चेतावनी है जिसे यरूशलेम के आस-पास के समाज के प्रति यहोवा ने प्रेषित किया। यह पवित्र शहर और उसके त्रुटिपूर्ण जीवन-पथ के विरुद्ध एक कठोर दायित्व उठाती है, जिसमें पाप के कारण आने वाले दंड का स्पष्ट चित्रण है। अध्याय 1 में तत्कालीन असंयम, धार्मिक वैचारिकता और समाजिक भ्रष्टाचार के प्रति चेतावनी दी गई है ताकि लोग पश्चात्ताप करें और ईश्वर के मार्ग पर लौटें।
व्याख्यात्मक अवलोकन
- पंक्ति का केंद्र यह है कि पाप की गम्भीरता और उसके दुष्परिणाम कितने भयावह होते हैं: अंधेपन के समान चतुर्गति, लहू का धूलि के समान गिरना और माँस का विष्ठा के समान। यह एक असहाय स्थिति का प्रतीक है जहाँ लोग सही निर्णय नहीं कर पाते।
- यहाँ न्याय का सक्रिय हस्तक्षेप है: यहोवा अपने लोग, विशेषकर दोषपूर्ण नेतृत्व, के विरुद्ध सख्त क्रिया करता है ताकि मानवीय आत्मा स्वयं मार्ग परिवर्तन करे।
मुख्य निष्कर्ष
अनुकरणीय अवलोकन (पर्ले के उद्धरण के अनुरोध के अनुसार चयनित हिस्से)
मैथ्यू हेनरी, ऐल्बर्ट बर्न्स तथा एडम क्लार्क से संग्रहीत सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के पूर्ण उद्धरण अत्यंत संक्षेप में ही शामिल हैं:
मार्गदर्शक निष्कर्ष: इन टिप्पणीकारों का सामान्य संदेश यही है कि पाप के परिणाम स्पष्ट हैं, और भविष्य में सुधार के लिए पुकार है—परन्तु यह भी कि ईश्वर दयालुता के अवसर देता है ताकि मनुष्य वापस आ सके।
अन्य संदर्भ-जोड़ और उनका संकेत
- यिर्मयाह 6:15 के समान चेतावनी दिखाती है कि पाप पर चूकने से समाज में नैतिक गिरावट आती है, और वही दंड के लिए प्रेरित करती है।
- मिनन्यू 3:6-7 जैसे पाठ धर्म-नेतृत्व पर दायित्व का स्मरण कराते हैं कि यदि नेतृत्व पथभ्रष्ट हों तो पूरे समाज प्रभावित होते हैं।
- जोशुआ 7:11-12 में पाप के कारण समाजिक पराजय और आघात का दृश्य मिलता है, जो यहाँ सपनों से भी उभरकर आया है।
संक्षिप्त प्रायोगिक निष्कर्ष
1) पाप के विरुद्ध कठोर दंड के विचार से डरावना परन्तु आवश्यक सच है; 2) यह चेतावनी है कि वास्तविक परिवर्तन केवल बाह्य धार्मिकता से नहीं, बल्कि आंतरिक पश्चात्ताप और ईश्वर के मार्ग पर दृढ़ लौटने से आता है; 3) समाज-नेतृत्व और सामूहिक आचरण में सत्य-निष्ठा स्थापित करना परमेश्वर की इच्छा है।