Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
1 शमूएल 1 1 शमूएल 2 1 शमूएल 3 1 शमूएल 4 1 शमूएल 5 1 शमूएल 6 1 शमूएल 7 1 शमूएल 8 1 शमूएल 9 1 शमूएल 10 1 शमूएल 11 1 शमूएल 12 1 शमूएल 13 1 शमूएल 14 1 शमूएल 15 1 शमूएल 16 1 शमूएल 17 1 शमूएल 18 1 शमूएल 19 1 शमूएल 20 1 शमूएल 21 1 शमूएल 22 1 शमूएल 23 1 शमूएल 24 1 शमूएल 25 1 शमूएल 26 1 शमूएल 27 1 शमूएल 28 1 शमूएल 29 1 शमूएल 30 1 शमूएल 31

1 शमूएल 21:14 पर संक्षिप्त व्याख्या
यह हिस्सा दाऊद की भगवान से नहीं बल्कि मानवीय संकटों के बीच निभाई गई चतुराई और आत्म-नियंत्रण की मिसाल है। आकीश के किले में दाऊद, वह व्यक्ति जो परमेश्वर की वाणी के अनुसार चलना चाहता है, अचानक मिले संकट के सामने उकसा हुआ महसूस करता है। उसका मुलाकाती परिदृश्य बताता है कि परमेश्वर के साथ चलना तब भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है जब परिस्थितियाँ धोखे, भय या राजनीतिक दबाव से प्रभावित हों। आकीश का चुपचाप यह कहना कि वे बावले हैं, एक प्रकार की राजनीति-स्तर पर प्रतिक्रिया है—जो दिखाती है कि सत्ता-संरचना किस प्रकार खतरनाक अंधविश्वासों और गलतफहमी की जड़ें खोल सकती है।
मूल भावार्थ और केंद्रीय विचार
यह वाक्य यह संकेत देता है कि दाऊद ने एक युद्ध-समय जैसी स्थिति से गुजरते हुए भी अपनी सुरक्षा के लिए सचेतिपূর্ণ बचाव-उद्धरण खोजे। आकीश का तात्पर्य यह है कि दाऊद का उपहास-युक्त या कुछ हास्यास्पद व्यवहार करना राज्य-नीतियों के अनुसार एक “बावला” की तरह है—पर वास्तविकता यह है कि दाऊद ने संकट के बीच भी नीति और विवेक बनाए रखा। इससे यह पाठ उभरता है कि ईश्वर के लोगों के लिए विवेक, धीरज और आत्म-नियंत्रण आवश्यक है ताकि परिस्थितियाँ भी उनके उद्धार में बाधक न बनें।
दो–तीन प्रमुख विषय
संदर्भ और सीधे लिंक के विचार
छोटे cross-links जो इस दृश्य से जुड़ते हैं:
इन संदर्भों से समझ आता है कि संकट के समय भी भक्त को सत्य और विवेक के साथ चलना चाहिए, डर से प्रेरित गलत फैसले से बचना चाहिए।
व्यावहारिक चिंतन
- कठिन परिस्थितियों में भी नीति और सत्य का संयोजन बनाए रखना सीखें।
- भय के क्षणों में भी ईश्वर की सहायता की आशा न छोड़ें; दया और विवेक से काम लें।
संक्षेप
यह वाक्य दर्शाता है कि संकट के सामने भी परमेश्वर के अनुयायियों को विवेक, धैर्य और नीति की ज़रूरत रहती है ताकि वे अपनी रक्षा कर सकें और ईश्वर की योजना के अनुसार आगे बढ़ सकें।
उद्धृत विचार: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से अल्प-उद्धरण आवश्यकता हो तो नीचे जहाँ-जहाँ उपयुक्त हो वहीं संकीर्ण रूप में जोड़ा गया है।
गौरतलब शास्त्र-पथ: 1 शमूएल 21:14 (HINIRV)