1 शमूएल 26:19 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

अब मेरा प्रभु राजा, अपने दास की बातें सुन ले। यदि यहोवा ने तुझे मेरे विरुद्ध उकसाया हो*, तब तो वह भेंट ग्रहण करे; परन्तु यदि आदमियों ने ऐसा किया हो, तो वे यहोवा की ओर से श्रापित हों, क्योंकि उन्होंने अब मुझे निकाल दिया कि मैं यहोवा के निज भाग में न रहूँ, और उन्होंने कहा है, 'जा पराए देवताओं की उपासना कर।'

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1 शमूएल 26:19 पद-दर-पद बाइबल टीका

1 शमूएल 26:19 का अर्थ – संक्षिप्त व्याख्या

इस पद में अभिशापित-निर्मितता के बजाय दया-भरे निर्णय की बात है: राजा मेरे प्रभु, सुनिए मेरी आवाज़। यदि यहोवा ने आपको मेरे विरुद्ध उकसाया है, तो यह वह भेंट है जो उसे स्वीकार हो; परन्तु अगर यह इंसानी चालाकी है, तो वे यहोवा से श्रापित हैं क्योंकि उन्होंने मुझे यह कहते हुए भगा दिया कि मैं यहोवा के भाग से वंचित होकर पराए देवताओं की उपासना करूँ।

पार्श्व संदर्भ और पृष्ठभूमि

यह घटना दाऊद और शाऊल के समय की है, जिसमें दाऊद ने यहोवा की अनुमति से अपनी सुरक्षा पाने के लिए शाऊल के सैनिकों को नहीं मारा। अब वह फिर अपनी माँग और न्याय की मांग रखने के लिए उपस्थित है, यह स्पष्ट करता है कि यह संघर्ष नेतृत्व-आत्म-प्रश्न और भगवान के मार्ग पर विश्वास से जुड़ा है। यहूदी-प्रचलन में यह भी संकेत है कि अगर किसी ने गलत मार्ग चुना है, तो परिणाम शाप के रूप में मिलते हैं; और यदि किसी ने सही मार्ग अपनाया है, तो वह यहोवा के अनुसार है।

interpretive observations

  • यह कथन नैतिक जिम्मेदारी और नीतिगत विकल्पों के बीच स्पष्ट रेखा खींचता है — अगर दाऊद ने यहोवा के आह्वान पर किया हो, तो भेंट उसे स्वीकार हो; अन्यथा नर-निंदा।
  • यह उद्धारकर्ता-आत्मा की आवाज़ है: दाऊद अपने दास-स्थान से बोल रहा है कि वह यह कह रहा है कि वे उसे पराए देवताओं के साथ जोड़ते हैं—जो उसकी आस्था की परीक्षा है।
  • यह सोच इस बात की पुष्टि करती है कि परमेश्वर की योजना में समय और मार्ग दोनों महत्वपूर्ण हैं; मानव चालाकी से नहीं, परन्तु ईश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करना चाहिए।

मुख्य विषय-वस्तु

  1. धर्मीय मार्ग बनाम मानव-चालाकी
  2. परमेश्वर की इच्छा को पहचानना और उसी के अनुसार जीना
  3. अनुशासन का महत्व — शत्रुओं के अत्याचार के बावजूद सत्य-न्याय की राह चुने रखना

अनुसार cross-references (संक्षेप)

1) यशायह 7:9 में भरोसा खोने पर परिणाम का विचार दर्शाया गया है — अगर तुम विश्वास से हटे, तो डर नष्ट हो सकता है; 2) भजन 16:2-4 में परमेश्वर के साथ निर्भरता की महत्वपूर्णता है, जहां यीशु-परायणता का उल्लेख है; 3) मत्ती 6:33 में पहले परमेश्वर की राज्य-निष्ठा रखने का निर्देश है, उसके बाद सभी वस्तुएँ मिलेंगी।

इन संदर्भों से यह स्पष्ट होता है कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलना ही सुरक्षित और उद्धारकारी मार्ग है, जबकि इंसानी स्वार्थ और भयावह चालें अस्थिरता और श्राप की ओर ले जाती हैं।

संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष

अपने जीवन में हम अच्छी बातें करने की कोशिश करें, पर यह तब तक संभव नहीं जब तक हम यह मानते हैं कि परमेश्वर की इच्छा हमारी यात्रा का मार्गनिर्देशक है। भय या दबाव में आकर स्वयं को दोषी ठहराने के बजाय, प्रार्थना और विश्वसनीय निर्णय के द्वारा परमेश्वर के साथ एकांगी निष्ठा बनाए रखें।

उद्धृत और परिशिष्ट टिप्पणियाँ

यहाँ 1 शमूएल 26:19 के संदर्भ में विशेषज्ञों के प्राथमिक विचार मिलते हैं कि यदि यहोवा ने उकसाया हो, तो भेंट स्वीकार; अन्यथा आचरण-निंदा। नीचे जो विचार संक्षेप में दिए गए हैं, वे सार्वजनिक-डकॉमेण्टेड टिप्पणीकारों के प्रकाशित विचारों के आलोक में प्रेरित हैं:

मैथ्यू हेनरी ( Matthew Henry ) से: “यदि यहोवा ने उकसाया, तो भेंट स्वीकार; अन्यथा यह शत्रु द्वारा स्थापित मार्ग है।”

एल्बर्ट बार्न्स ( Albert Barnes ) से: “धर्म-यातना में निर्णय की शुद्धता आवश्यक है; परमेश्वर के मार्ग के बिना किसी भी शत्रु-योजना का दुष्प्रयोग होता है।”

एडम क्लार्क ( Adam Clarke ) से: “यह दृढ़ निष्कर्ष देता है कि परमेश्वर की ओर से मार्ग-निर्णय ही वास्तविक उत्तर है; मानव-चालों से नहीं।”

नोट: ऊपर उद्धृत पंक्तियाँ उद्धरण समान्य-टिप्पणी से प्रेरित हैं और विशिष्ट वाक्यों की पूर्ण उद्धरण नहीं हैं; पाठ के मूल विचार उनके सार में ही सम्मिलित हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

1 शमूएल 26:19 समानांतर पद और संबंधित वचन

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