1 शमूएल 26:11 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

यहोवा न करे कि मैं अपना हाथ यहोवा के अभिषिक्त पर उठाऊँ; अब उसके सिरहाने से भाला और पानी की सुराही उठा ले, और हम यहाँ से चले जाएँ।”

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1 शमूएल 26:11 पद-दर-पद बाइबल टीका

1 शमूएल 26:11 — संदर्भ और गूढ़ अर्थ

यह पद उस समय का दृश्य बताता है जब दाऊद ने शिकना के बहाने अभिषिक्त राजा सहब, साऊल के पीछा करते समय भीषण खतरे के बावजूद प्रतिदिन किया गया हत्या-आह्वान नहीं उठाने का निर्णय किया। साऊल ने उसे खोजने के लिए भाला उठाया था; यहाँ दाऊद कहता है कि वह अपने हाथ को अभिषिक्त पर उठाने का साहस नहीं करेगा, और सिरहाने से भाला और पानी की सुराही उठाते हुए तुरंत वहाँ से चले जाने का निर्देश देता है। यह एक स्पष्ट संकेत है कि दाऊद का निर्णय परमेश्वर की योजना और अभिषिक्तों के प्रति सम्मान के आधार पर है, न कि अपनी शक्ति या संदेह की माँग पर।

मुख्य अर्थ

दाऊद का मुख्य संदेश यह है: परमेश्वर के अभिषिक्त के विरुद्ध प्रत्यक्ष हिंसा से बचना चाहिए; चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी डरावनी क्यों न हों, ईश्वर के चयनित के विरुद्ध हाथ उठाने से रोकना चाहिए। वह कहता है कि हृदय में विश्वास है कि परमेश्वर अपनी योजना के अनुसार काम कर रहा है; वह खुद को सुरक्षा देने वाले परमेश्वर के हाथ में छोड़ना चाहता है, न कि मानव-पराक्रम से जोखिम उठाना।

दो प्रमुख विषय

  1. ईश्वर के अभिषिक्त के सम्मान की रक्षा: दाऊद की यह बात अभिषिक्त राजा के प्रति सम्मान और ईमानदारी का द्योतक है; वह समझता है कि परमेश्वर ने साऊल को सत्ता दी है, इसलिए उसे नुकसान पहुँचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
  2. विश्वास और परमेश्वर की योजना पर भरोसा: डर के समय भी दाऊद अपनी रक्षा के लिए खुद को God के हाथों में देता है, यह दिखाता है कि कूटनीति से भी अधिक परमेश्वर की योजना पर निर्भर रहना चाहिए।

विचार-श्रेणियाँ ( themes )

  • संयम और संरक्षण: हिंसा से बचना, भगवान के चयनित पर निर्दोषता रखना।
  • अनुमोदन बनाम संघर्ष: अपने अधिकार का दावा नहीं, बल्कि परमेश्वर की व्यवस्था को मानना।
  • विश्वास की चेष्टा: संकट के समय में भी ईश्वर पर भरोसा बनाए रखना।

अन्य प्रकाशित टिप्पणी से सम्बन्ध

Matthew Henry और Adam Clarke बताते हैं कि यहाँ दाऊद का निर्णय यह दिखाता है कि परमेश्वर के निर्णय के विरुद्ध कुछ भी कर लेना उचित नहीं; भरोसा और विनम्रता से आगे बढ़ना चाहिये। Albert Barnes भी इस बात को जोड़ते हैं कि अभिषिक्त के प्रति सम्मान रखकर दाऊद ने अपने जीवन की सुरक्षा के लिए ईश्वर की योजना की पूजा की—जो कि ईश्वर के विरुद्ध कदम उठाने से अधिक विश्वसनीय मार्ग था।

क्रॉस-रेफरन्स ( संदेह/सम्बन्धित पाठ )

यहे 1) एकता और संस्थान के सम्मान के बारे में अन्य संदर्भ — रोम 13:1-2 (सरकार के अधीन रहने की विवेकपूर्ण सीमा); 2) 2 शमूएल 11–12 (दैवीय योजना के अनुरोध में नीतिगत विवेक और पाप से दूरी); 3) प्रवचनों 24:21–22 (ईश्वर की योजना और अभिषिक्त के सम्मान के महत्व की अनुभूति).

व्यावहारिक चिंतन

हमारे जीवन में कभी-कभी दबाव होता है कि हम ऐसे कदम उठाएँ जो किसी प्रभु के अभिषिक्त के विरुद्ध हों या उनके खिलाफ हों। इस पद से प्रेरणा पाएं: खतरे के समय भी न्याय, धैर्य और आत्म-समर्पण से काम लें। यदि स्थिति स्पष्ट रूप से हिंसा या अन्याय को जन्म दे, तो ईश्वर की योजनाओं में विश्वास रखें और संवेदनशीलता के साथ उपाय करें—पर अधिकार का दावा न उठाएं।

संक्षिप्त निष्कर्ष

1 शमूएल 26:11 में दाऊद ने दिखा दिया कि अभिषिक्त के प्रति सम्मान, विभाजन की स्थिति में भी जीवन की सुरक्षा और परमेश्वर की योजना की समर्पण किस प्रकार एक विश्वासयोग्य जीवन का आधार बनते हैं। यह मार्ग हमें सच्चे दासत्व और धैर्य की शिक्षा देता है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

1 शमूएल 26:11 समानांतर पद और संबंधित वचन

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वह अपने जनों से कहने लगा, “यहोवा न करे कि मैं अपने प्रभु से जो यहोवा का अभिषिक्त है ऐसा काम करूँ, कि उस पर हाथ उठाऊँ, क्योंकि वह यहोवा का अभिषिक्त है।”

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यहोवा मेरा और तेरा न्याय करे, और यहोवा तुझ से मेरा बदला ले; परन्तु मेरा हाथ तुझ पर न उठेगा।

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दाऊद ने उससे कहा, “तू यहोवा के अभिषिक्त को नष्ट करने के लिये हाथ बढ़ाने से क्यों नहीं डरा?”

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