Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकी2 शमूएल 6:7 बाइबल पद की व्याख्या
2 शमूएल 6:7 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तब यहोवा का कोप उज्जा पर भड़क उठा; और परमेश्वर ने उसके दोष के कारण उसको वहाँ ऐसा मारा, कि वह वहाँ परमेश्वर के सन्दूक के पास मर गया।
2 शमूएल 6:7 पद-दर-पद बाइबल टीका
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2 शमूएल 6:7 समानांतर पद और संबंधित वचन
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1 शमूएल 6:19 (HINIRV) »
फिर इस कारण से कि बेतशेमेश के लोगों ने यहोवा के सन्दूक के भीतर झाँका था उसने उनमें से सत्तर मनुष्य, और फिर पचास हजार मनुष्य मार डाले; और वहाँ के लोगों ने इसलिए विलाप किया कि यहोवा ने लोगों का बड़ा ही संहार किया था।

1 इतिहास 15:13 (HINIRV) »
क्योंकि पिछली बार तुम ने उसको न उठाया था इस कारण हमारा परमेश्वर यहोवा हम पर टूट पड़ा, क्योंकि हम उसकी खोज में नियम के अनुसार न लगे थे।”

1 इतिहास 13:10 (HINIRV) »
तब यहोवा का कोप उज्जा पर भड़क उठा; और उसने उसको मारा क्योंकि उसने सन्दूक पर हाथ लगाया था; वह वहीं परमेश्वर के सामने मर गया।
2 शमूएल 6:7 — परमेश्वर के सम्मान और पवित्रता की चेतावनी
यह पद दर्शाता है कि परमेश्वर के आराधन और उसके पवित्र सन्दूक के प्रति भक्ति में अनुष्ठानिक सावधानी और सामान्य मानवीय प्रवृत्ति के बीच सन्तुलन कितना आवश्यक है. यूनानी या इब्रानी सभ्यता के आराधन के नियम हल्के नहीं थे; परमेश्वर की महिमा के सामने हमारी साधना में गलतियाँ भारी परिणाम दे सकती हैं। यह अंश हमें यह याद दिलाता है कि परमेश्वर का सम्मान केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि एक जीवन के भीतर समर्पण का सत्य है.
ऐतिहासिक संदर्भ और पाठ का मूल अर्थ
यहोवा की अर्थपूर्ण उपस्थिति के साथ सन्दूक का आना जुनून और समर्पण का समय है, परन्तु उस दिन उन्नति के साथ एक गंभीर चूक भी हो जाती है। सन्दूक कुछ समय पहले से उठाकर लाया गया, किंतुitta के नियमों के विरुद्ध परवाह न कर पाने के कारण, एक विशिष्ट गलती से परमेश्वर क्रोध में आ जाते हैं और उस व्यक्ति को मृत्यु हो जाती है जो उसकी पवित्रता के विरुद्ध जाते हुए उसे नुकसान पहुँचाने के प्रयास में था। यह घटना सन्दूक को “सन्दूक के पास मर गया” के रूप में वर्णन करती है—एक ऐसा परिणाम जो लोगों के लिए चेतावनी और सबक बनता है कि परमेश्वर की पवित्रता के सामने हमारे कदम कितने सावधानीपूर्ण होने चाहिए।
मुख्य संदेश
1) परमेश्वर की पवित्रता का सम्मान सबसे पहले है: जो भी उसकी पवित्र सामंजस्य से खेलता है, उसे परिणाम भुगतने पड़ते हैं। 2) भक्ति का हर क्रिया-कलाप, चाहे वह आंदोलनों में कैसे भी उत्साहपूर्ण हो, परमेश्वर के नियमों के अनुरूप होना चाहिए। 3) भय और आस्था के बीच संतुलन रखना चाहिए—न तो भय से निष्क्रिय हो जाएँ और न ही निर्भीक होकर नियमों को तोड़ें।
अनुशासन और आराधना: रोशनी से सीख
यह घटनाक्रम हमें याद कराते हैं कि आराधना में ज्ञान और विवेक भी आवश्यक है. जैसा कि पवित्र ग्रंथ में कहा गया है, “आत्मा पवित्र है, और तुम्हें उसकी पवित्रता के अनुसार आचरण करना चाहिए.” साधना के समय समुदाय की जिम्मेदारी यह है कि हम परमेश्वर की पवित्रता के अनुरूप हों और किसी भी प्रथना या अभिषेक से पहले भीतर की स्थिति साफ करें।
क्रॉस-रेफरेंसेस
इन क्रॉस-रेफरेंसेस से पता चलता है कि परमेश्वर की पवित्रता सदा से व्यक्तिगत विश्वास और समुदाय के आचरण दोनों को एक सूत्र में बाँधती है.
पवित्रता के नियम पर विचार
1) आदेशों के प्रति अचूक आचरण: केवल सतह से नहीं, भीतर से भी नियमों को मानना। 2) गुरुत्वपूर्ण उद्देश्य: आराधना का उद्देश्य परमेश्वर की महिमा है, आत्म-संतोष नहीं। 3) सामान्य और धार्मिक दोनों व्यवहारों में संतुलन: उत्साह के साथ विवेक जरूरी है ताकि पवित्रता न टूटे।
देवotional reflection
हम में से हर אחד की आराधना में यह सच जड़ बनता है कि परमेश्वर की महिमा हमारी सर्वोच्च लक्ष्य है. कब्रों-सी सावधानी और गर्मजोशी के बीच संतुलन बनाते हुए, हमें यह याद रखना चाहिए कि ईश्वर के सामने बढ़चढ़ कर प्रदर्शन महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि उसकी पवित्रता के अनुरूप जीवन जीना अधिक है. जब कभी हम भक्ति के रास्ते पर चलते हैं, तो अपनी वस्तुओं, विचारों और इरादों को नयी स्पष्टता से जाँचें—क्या वे परमेश्वर के सम्मान के अनुरूप हैं? यह विचार हमें日ित और नम्र बनाते हैं, ताकि परमेश्वर के आशीर्वाद सुरक्षित रहें और सहभागिता बनाए रहे।
ऐतिहासिक टिप्पणीकारों में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke ने इस घटना में परमेश्वर की पवित्रता और मानव विवेक के संतुलन के महत्व को जोर देकर कहा है। उदाहरण के लिए, Henry ने पवित्रता के प्रति 天天 के अनुरोध को रेखांकित किया है; Barnes ने नियम-पालन के महत्व पर बल दिया है; Clarke ने परमेश्वर की प्राथना के साथ मानव-अनुदेश के सम्बन्ध को स्पष्ट किया है. यदि आवश्यक हो, तो उनके संक्षिप्त उद्धरण नीचे उपलब्ध हैं:
• Matthew Henry: “God's holiness requires our reverent fear and careful obedience.”
• Albert Barnes: “Sacred objects demand respectful, obedient conduct; neglect breaks divine order.”
• Adam Clarke: “The danger of irreverence in worship is the immediate judgment of God upon the offender.”