Old Testament
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निर्गमन 20:17 का पठन-पाठन: लालच से बचना
यही वाक्य התורה के दहकमारी नियमों में से एक है जो सामाजिक समानता, ईमानदारी और सुख-शांति की स्थापना करता है। निर्गमन 20 का यह भाग लोगों के बीच निजी संपत्ति और रिश्तों की पवित्रता की तरफ इशारा करता है। ईश्वर ने इस शपथादेश में कड़ाई से कहा कि किसी भी वस्तु के लिए लालच नहीं करना चाहिए—चाहे वह नारी हो, दास-दासी हों, पशु हों या अन्य कोई वस्तु।
यह पाठ क्या दिखाता है—ईश्वर और विश्वास के बारे में
यह आज्ञा बताती है कि ईश्वर के नैतिक कानून में अच्छाई के मानदंड बाहरी आकर्षण से प्रेरित नहीं होते, बल्कि आंतरिक चित्त की पवित्रता से आरम्भ होते हैं। लालच का मूल तत्व है—अनुपातहीन तृषा, जो दूसरों की खुशियों और संपत्ति की स्वीकृति को नहीं होने देती। परमेश्वर चाहता है कि हम अपने पड़ोसियों के अधिकारों का सम्मान करें और किसी के कर्म-संपत्ति के संदिग्ध लाभ से दूर रहें।
शब्दों और चित्रों की स्पष्टता
“लालच” यहाँ एक आंतरिक आसक्ति है जो लोगों की सीमाओं को लांघ देती है—घर की चीजें, पत्नी, दास-दासी, बैल-गदहा और अन्य वस्तुएँ भी सामाजिक-आर्थिक संतुलन के क्षेत्र में आते हैं। यह केवल चोरी नहीं है, बल्कि चाहना का आंतरिक मोह है जो दूसरों के अधिकारों पर असर डाल सकता है।
अन्य संदर्भ जो इस विचार से जुड़ते हैं
यह विचार अन्य कानूनों के साथ भी तालमेल बैठाता है—धन के साथ ईमानदारी, माता-पिता के सम्मान, और पड़ोसी के अधिकार।
स्पष्ट शब्द-संरचना के अर्थ
• “घऱ का लालच”: अपने नजदीकी के निजी आनंद और सुरक्षा की आकांक्षा।
• “स्त्री का लालच”: किसी की पत्नी के प्रति अनुचित आकर्षण या सम्मान-लाभ के मोह से बचना।
• “दास-दासी, बैल गदहे”: समाज के कमजोर वर्गों के अस्तित्व और उनके उपयोग के अधिकारों का सम्मान।
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षेप)
यही नैतिक चेतावनी दूसरों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील रहने की प्रेरणा देती है—याद रहे कि प्रेम सत्य-सहिष्णुता है (रोम 13:9-10); मनुष्य की लालच उसके स्वाद को नहीं बढ़ाती, बल्कि उसे जीने के रास्ते से हटा देती है (1 तीमुथ 6:9-10)।
आज के समय में अनुप्रयोग
एजेंडा-रहित, आंतरिक शुद्धता पर केंद्रित यह नियम आज भी भरोसे, सुरक्षा और सामाजिक समरसता का आधार है।
मानक टिप्पणियाँ (संक्षेप)
यह पाठ धारणाओं में तीन केंद्रीय बिंदु देता है: ईश्वर की नैतिक व्यवस्था के प्रति आस्थापूर्ण समर्पण, दूसरे के अधिकारों की पवित्रता, और आत्म-लालच पर नियंत्रण—जो आज भी व्यक्तिगत और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं।