Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
उत्पत्ति 1 उत्पत्ति 2 उत्पत्ति 3 उत्पत्ति 4 उत्पत्ति 5 उत्पत्ति 6 उत्पत्ति 7 उत्पत्ति 8 उत्पत्ति 9 उत्पत्ति 10 उत्पत्ति 11 उत्पत्ति 12 उत्पत्ति 13 उत्पत्ति 14 उत्पत्ति 15 उत्पत्ति 16 उत्पत्ति 17 उत्पत्ति 18 उत्पत्ति 19 उत्पत्ति 20 उत्पत्ति 21 उत्पत्ति 22 उत्पत्ति 23 उत्पत्ति 24 उत्पत्ति 25 उत्पत्ति 26 उत्पत्ति 27 उत्पत्ति 28 उत्पत्ति 29 उत्पत्ति 30 उत्पत्ति 31 उत्पत्ति 32 उत्पत्ति 33 उत्पत्ति 34 उत्पत्ति 35 उत्पत्ति 36 उत्पत्ति 37 उत्पत्ति 38 उत्पत्ति 39 उत्पत्ति 40 उत्पत्ति 41 उत्पत्ति 42 उत्पत्ति 43 उत्पत्ति 44 उत्पत्ति 45 उत्पत्ति 46 उत्पत्ति 47 उत्पत्ति 48 उत्पत्ति 49 उत्पत्ति 50Verse
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युक्तीनुसार उत्पत्ति 18:28 का उद्देश्य औरार्थ
इस व verse का साक्षात्कार यह बताता है कि परमेश्वर कितनी धैर्यपूर्वक करुणा दिखाते हैं और कैसे वह नैतिक दायित्वों के साथ न्याय और दया के बीच संतुलन बनाते हैं। पतोहों की गिनती में वृद्धि घटाने की बात यह संकेत देती है कि परमेश्वर हर धर्मी के भरोसे पर भी नगर के आचरण के अनुसार निर्णय लेते हैं; यदि नुकसान कम हो, तो भी वह नगर को नाश नहीं करते।
पृष्ठभूमि संक्षेप
यह अध्याय, अब्राहम तथा परमेश्वर के बीच संवाद का हिस्सा है, जहाँ परमेश्वर ने सोचना शुरू किया कि सुदूर शहरों की पाप की मात्रा और उनकी दया की मांग के बीच कहाँ तक न्याय का संचालन किया जाए। अब्राहम यह मानकर दुःखित होते हैं कि कुछ धर्मी रहते हुए भी नगर का नाश हो सकता है।
व्याख्यात्मक अवलोकन
— परमेश्वर का प्रस्ताव नगरों के बारे में क्षमाशीलता और दया का संकेत देता है: अगर उनमें 50 धर्मी मिल जाएँ, तो नगर नहीं नष्ट किया जाएगा।
— अब्राहम की intercession गवाही देती है कि उसकी प्रार्थना और तर्क, परमेश्वर की न्यायप्रियता और दया के बीच संतुलन स्थापित करते हैं।
— पाठ से यह धारणा निकलती है कि धार्मिक समुदाय में कुछ भी कम नैतिक होने पर भी, संकीर्ण न्याय से बचाव संभव है जब तक कि धर्मी लोग परमेश्वर की सच्चाई के साथ खड़े हों।
मुख्य विचार
क्रॉस-रेफरेंस और संक्षिप्त व्याख्या
1) यिर्मयाह 18:7-8 – परमेश्वर बोलते हैं कि वह जाति के गिर जाने पर भी परिवर्तन कर सकता है जब वे पश्चाताप करें। यह उद्धार की आशा को प्रकट करता है कि नाश तब तक नहीं होता जब तक धर्मी रोशनी में रहते हैं।
2) यूहन्ना 3:17 – परमेश्वर संसार को नष्ट करने नहीं आया, बल्कि उसे उद्धार दें। अब्राहम की प्रार्थना इस दया को संदर्भित करती है।
3) रोम 11:22 – यदि तुम स्थिर रहो, तो ईश्वर की करुणा तुम्हारे साथ बनी रहेगी; अन्यथा तुम भी नगर की तरह हो सकते हो।
संक्षिप्त निष्कर्ष
उच्चारित भाग से स्पष्ट होता है कि परमेश्वर की दया और न्याय की परिपक्वता एक ही दायरे में चलते हैं। अगर पचास धर्मी मिलें, तो नगर नाश नहीं होगा; यदि यह संख्या घटे, तो भी परमेश्वर अविलंब नाश की डोर नहीं खींचते जब तक कि सचेत रूप से धर्म की राह पर चलने का उदाहरण प्रस्तुत हो। इसमें पाठक यह सीखते हैं कि समुदाय की नैतिकता,Prayerful intercession, और परिवर्तन-युग के अनुरोध परमेश्वर के दयालु निर्णयों को प्रभावित करते हैं।
उद्धृत विचारधारा (संक्षेप)
निष्कर्षतः इस पाठ से प्रेरित होकर हम समझते हैं कि परमेश्वर की नीति में दया भी है और न्याय भी; यदि समाज में सांस लेने वाले धर्मी रहते हैं, तो नाश दूर रहता है।