Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 10:3— immediate setting
यिर्मयाह के व्यक्तव्य में परमेश्वर के विरुद्ध लोगों की घरेलू और राष्ट्रीय धार्मिक रीति-रिवाजों को चुनौती दी जा रही है। यहाँ विशिष्टता से देशों की रीतियों का उल्लेख है और उनके मिथ्या पूजा-आचार पर प्रहार किया गया है। यह भाग प्रलयकारी चेतावनी के क्रम में आता है, जब यिर्मयाह राष्ट्र के पापों के कारण आने वाले दंड को उजागर करता है और सत्य के मार्ग की ओर प्रेरित करता है।
पाठ का कारण और संदेश— परमेश्वर बनाम मानव-निर्मित मूरतें
वाक्य कहता है कि देशों की रीतियाँ “निकम्मी” हैं, क्योंकि वे मानव निर्मित आस्तियाँ और ड्राइंनिंग-येसी प्रकार की पूजा पर आधारित हैं। मूरतें लकड़ी के टुकड़े से बनी बस एक कारीगर की कल्पना और भौतिक बनाावट मात्र है; वह भी वन से काटी गई काठ से। यह दिखाता है कि धार्मिक कर्म केवल बाह्य आभा और कला पर निर्भर हैं, आंतरिक जीवन, श्रद्धा, और सही पथ पर नहीं। परमेश्वर इन सब को नहीं मानते; उनका आह्वान मौलिक है—तभी तो वह कहते हैं कि वे निर्थक हैं और परिवर्तनशील हैं।
गुरुत्वपूर्ण शब्दों एवं चिह्नों की स्पष्ट व्याख्या
अनुशंसा किया गया संदर्भ— निकट पाठ्य-क्रॉस संदर्भ
– रोम 1:22-23 में देखा जा सकता है कि लोग परमेश्वर की सच्ची praatna को छोड़ कर अपनी बुद्धि के अनुसार मूर्तियों की पूजा करते हैं; यह पाठ यह बताता है कि मौलिक तृष्णा कब और कैसे मिस-मार्ग पर जाती है।
– 2 कुरिन्थियों 4:18 में कहा गया है कि बाहरी दृश्य से अधिक आंतरिक चैतन्य को महत्व दें, ताकि सत्य परमेश्वर के साथ दृढ़ बना रहे।
– दानिये (दानियेल) 2:31-45 में ऐतिहासिक चित्रण है जिसमें मानवीय राजा-मालिक के निर्माण से धार्मिक संकट की स्थिति स्पष्ट होती है; यह क्रूर सत्ता के बजाय ईश्वर-प्रधान राज्य की अपेक्षा पर बल देता है।
प्रतीकात्मक चित्रण और Faith में शिक्षा
यह वाक्य केवल अतीत के पापों की स्मारक नहीं है, बल्कि आज भी लोगों के मन में ऐसे बाह्य चिह्नों के प्रति आस्था को चुनौती देता है। मूरतें, पवित्र मूर्तियाँ, या धार्मिक औपचारिकताएँ यदि आंतरिक पवित्रता और ईश्वर के साथ व्यक्तिगत संबंध के बिना हों, तो वे निर्थक हो सकती हैं। हमेशा परमेश्वर के साथ ईमानदार और उद्धारकर्ता विश्वास चाहिए, जो दैहिक रीतियों से नहीं, स्व-संवर्धन और पवित्र जीवन से प्रकट होता है।
जीवन-वृत्ति के लिए today’s application
कुल मिलाकर यिर्मयाह 10:3 से यह स्पष्ट होता है कि परमेश्वर केवल बाहरी रीतियों पर नहीं, बल्कि दिली श्रद्धा और ऐसे जीवन पर बल देता है जो सत्य के पथ पर चलकर उनका आज्ञापालन करें।
महत्वपूर्ण उद्धरण (यदि उपलब्ध):
Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से पूर्ण वाक्यांशित उद्धरण नीचे शब्द-शब्द नहीं, पर विचार-आधार के अनुसार समाहित हैं।
Cross-reference: रोम 1:22-23; 2 कुरिन्थ 4:18; दानियेल 2:31-45