Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 10:6 का तुरंत परिचय
यिर्मयाह नबी की भविष्यवाणी संदर्भ में यह शब्द उस समय के संदर्भ को दर्शाते हैं जब ईश्वर के अपने लोग आस्तीन के झाँकते मूर्ति-वत्सल्य से दूर रहे थे और जिस परमेश्वर के विरुद्ध अन्य देव-तस्वीरें खड़ी की जाती थीं, उनके साथ सत्य और एकत्व का संघर्ष चल रहा था। यह वचन भविष्यवाणी और चेतावनी के बीच एक सुसंगत संहारक पाठ है: परमेश्वर केवल एक है, और उसकी महिमा सभी जगह फैली है।
ईश्वर के बारे में पाठ से निकलते समझ
यह उद्धारक उद्घोष हमें दो प्रमुख बातें सिखाता है: (1) ईश्वर का समान नहीं है; (2) उसका नाम, पराक्रम और महानता सभी प्रकटन में सर्वोपरि है। यह वही परमेश्वर है जो सृष्टि के हर कोने में जीवंत है और जो प्रवाह-प्रवाह में नहीं डूबता। यह वचन यह बताता है कि ईश्वर की वह आश्वासनभरी सत्ता और दिव्यता अद्वितीय है, जिसे कोई भी मानव-उपन्यास नहीं बदल सकता।
पद के महत्वपूर्ण शब्द और चित्र
संबंधित पवित्र ग्रंथ
उद्धरण से निकले कुछ संबंधित पदחק, जो ईश्वर की अद्वितीयता और महिमा को मजबूत करते हैं:
पूर्ववर्ती टीकाओं से जुड़े संकेत
हेजबल, मॉहारण तथा क्लार्क की टिप्पणी में प्रमुख बिंदु यही है कि ईश्वर की महिमा का अभिव्यक्त रूप अवश्य एक है, और मूर्तिपूजा या विविध देव-कल्पना उसे नहीं बदल सकतीं। एक विराम के रूप में हल्की-सी उद्धृत पंक्तियाँ पढ़ना सहज रहता है, पर मुख्य संदेश है: परमेश्वर के साथ तुलना संभव नहीं।
आज के संदर्भ में अनुप्रयोग
यह पाठ आज भी एक चेतावनी है कि हम अपने विश्वास में किसी प्रकार की भौतिक या मानसिक प्रतिमाओं से दूर रहें और एकेश्वरवाद में दृढ़ रहें। हमारी प्रार्थनाओं में परमेश्वर के उसी एक-पूर्ण ज्ञान और पवित्रता को केंद्र बनाएं। जब भी हम निजी जीवन, सामुदायिक सेवा या निर्णय-निर्माण में वैधता ढूंढ़ते हैं, तब यह याद रखें कि उसका नाम और उसकी महिमा सर्वोपरि है।
संक्षेप सार
यिर्मयाह 10:6 में प्रकटन है कि परमेश्वर के समान कोई नहीं, वह महान और उसका नाम पराक्रम में बड़ा है। यह कविता नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक उद्घोष है जो एकेश्वरवाद की आधारशिला रखता है और हर काल में श्रद्धा के मार्गदर्शक बनता है।
उद्धरण-ध्यान: “हे यहोवा, तेरे समान कोई नहीं है; तू महान है, और तेरा नाम पराक्रम में बड़ा है।” (यिर्मयाह 10:6)