Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52



यिर्मयाह 12:13 का समग्र अन्वेषण: उपज में कमी और परमेश्वर का क्रोध
मुख्य व्याख्यान बिंदु: परमेश्वर के क्रोध के कारण असफलता के विरुद्ध यहोवा की योजना में विश्वास और डटे रहने की आवश्यकता है; शांतिस्वरूप कामयाबी मानव प्रयासों से अधिक आशीष पर निर्भर है, और निष्कंटक रीति से खेत की फसलें भी परमेश्वर की स्वीकृति पर निर्भर करती हैं।
साहित्यिक संदर्भ में पाठ का अर्थ
यिर्मयाह के समय यरूशलेम के आसपास के किसान कर्मठ थे, परन्तु उनके खेतों में फसलें आना कठिन हो गया था। अध्याय 12 के इस भाग में यहोवा अपने भविष्यवक्ता के साथ खेती-बाड़ी की परंपरागत कामयाबी—बीज बोना, कटाई—की असफलता के कारण दर्शाता है कि वे अपने कर्मों में ईमानदार नहीं रहे। वे गेहूँ बोते हैं, परन्तु काँटीली झाड़ियाँ काटते हैं; कष्ट उठाते हैं, परन्तु लाभ नहीं मिला। यह एक प्रतीक है: धार्मिक आज़ादी के स्थान पर अत्याचार, सामाजिक अन्याय और पाप-चिन्तन ने उनके खेतों को बर्बाद कर दिया है।
पूर्वकथन संरचना और क्लू-फ्रेज
यह वाक्यांश “उन्होंने गेहूँ तो बोया, परन्तु काँटीली झाड़ियाँ काटे” एक गहरे विवेक का चित्र प्रस्तुत करता है: कर्मों के बावजूद परिणाम असफल रहें। यहोवा के क्रोध ने फसल के परिणामों को बाधित किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि बाहरी परिश्रम बिना आंतरिक धार्मिक परिवर्तन के संयुक्त नहीं हो पाता।
पवित्रशास्त्र के साथ प्रयोजन और theological significance
यह ठोस रूप में दिखाता है कि धार्मिक लग्न और राजनीति/कृषि के सफल परिणाम एक साथ नहीं चलते जब नैतिकता और धर्म-निष्ठा ग़लत राह पर हो। यहूदी समाज में अन्याय, शोषण और अविश्वास की परिस्थितियाँ इस फसल की कटाई-परिणाम के पीछे कारण हैं। यह संदेश हमें सम्बोधित करता है कि परमेश्वर के क्रोध का कारण सिर्फ व्यक्तिगत पाप नहीं बल्कि सामुदायिक पाप और व्यवस्था-उच्चतम मानकों के उल्लंघन हैं।
पवित्रशास्त्र से सम्बन्धित cross-references
संक्षेप में ये संदर्भ दर्शाते हैं कि परमेश्वर के मूल्यांकन में आंतरिक धार्मिकता और समाज-न्याय दोनों अनिवार्य हैं ताकि उपज और आशीष बनी रहे।
आत्म-चिंतन के लिये कुछ प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 12:13 हमारे लिए एक जागरूकता का पाठ है: कठिन परिश्रम और धार्मिक गतिविधियाँ तब तक प्रभावी नहीं जब हमारे हृदय में पाप, अन्याय और अविश्वास गहरे बैठे हों। परमेश्वर के क्रोध के कारण उपज में कमी एक चेतावनी है कि आत्म-निष्ठा और सामूहिक पवित्रता को पुनः स्थापित करना परमेश्वर की अनुमति से ही संभव है।
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