यिर्मयाह 12:13 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

उन्होंने गेहूँ तो बोया, परन्तु कँटीली झाड़ियाँ काटे, उन्होंने कष्ट तो उठाया, परन्तु उससे कुछ लाभ न हुआ। यहोवा के क्रोध के भड़कने के कारण तुम अपने खेतों की उपज के विषय में लज्जित हो।”

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यिर्मयाह 12:13 पद-दर-पद बाइबल टीका

यिर्मयाह 12:13 का समग्र अन्वेषण: उपज में कमी और परमेश्वर का क्रोध

मुख्य व्याख्यान बिंदु: परमेश्वर के क्रोध के कारण असफलता के विरुद्ध यहोवा की योजना में विश्वास और डटे रहने की आवश्यकता है; शांतिस्वरूप कामयाबी मानव प्रयासों से अधिक आशीष पर निर्भर है, और निष्कंटक रीति से खेत की फसलें भी परमेश्वर की स्वीकृति पर निर्भर करती हैं।

साहित्यिक संदर्भ में पाठ का अर्थ

यिर्मयाह के समय यरूशलेम के आसपास के किसान कर्मठ थे, परन्तु उनके खेतों में फसलें आना कठिन हो गया था। अध्याय 12 के इस भाग में यहोवा अपने भविष्यवक्ता के साथ खेती-बाड़ी की परंपरागत कामयाबी—बीज बोना, कटाई—की असफलता के कारण दर्शाता है कि वे अपने कर्मों में ईमानदार नहीं रहे। वे गेहूँ बोते हैं, परन्तु काँटीली झाड़ियाँ काटते हैं; कष्ट उठाते हैं, परन्तु लाभ नहीं मिला। यह एक प्रतीक है: धार्मिक आज़ादी के स्थान पर अत्याचार, सामाजिक अन्याय और पाप-चिन्तन ने उनके खेतों को बर्बाद कर दिया है।

पूर्वकथन संरचना और क्लू-फ्रेज

यह वाक्यांश “उन्होंने गेहूँ तो बोया, परन्तु काँटीली झाड़ियाँ काटे” एक गहरे विवेक का चित्र प्रस्तुत करता है: कर्मों के बावजूद परिणाम असफल रहें। यहोवा के क्रोध ने फसल के परिणामों को बाधित किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि बाहरी परिश्रम बिना आंतरिक धार्मिक परिवर्तन के संयुक्त नहीं हो पाता।

पवित्रशास्त्र के साथ प्रयोजन और theological significance

यह ठोस रूप में दिखाता है कि धार्मिक लग्न और राजनीति/कृषि के सफल परिणाम एक साथ नहीं चलते जब नैतिकता और धर्म-निष्ठा ग़लत राह पर हो। यहूदी समाज में अन्याय, शोषण और अविश्वास की परिस्थितियाँ इस फसल की कटाई-परिणाम के पीछे कारण हैं। यह संदेश हमें सम्बोधित करता है कि परमेश्वर के क्रोध का कारण सिर्फ व्यक्तिगत पाप नहीं बल्कि सामुदायिक पाप और व्यवस्था-उच्चतम मानकों के उल्लंघन हैं।

पवित्रशास्त्र से सम्बन्धित cross-references

  • यिर्मयाह 6:15 — नैतिक पतन के कारण शांति और समृद्धि का अंत; यह पाठ संदर्भ देता है कि आंतरिक पाप कैसे बाहरी सफलता को कठोरता से रोकते हैं।
  • यिर्मयाह 7:26-28 — सत्य-उद्धार के लिये पुकार और निष्क्रियता के कारण परमेश्वर की क्रोधित प्रतिक्रिया; समाज की पुकार को अनसुना करने पर दंड।
  • यहशiah 1:11-17 — धर्म के अभ्यास के साथ अन्याय का विरोध; बाहरी धार्मिक क्रियाकलापों के पीछे आंतरिक परिवर्तन की आवश्यकता की पुष्टि।

संक्षेप में ये संदर्भ दर्शाते हैं कि परमेश्वर के मूल्यांकन में आंतरिक धार्मिकता और समाज-न्याय दोनों अनिवार्य हैं ताकि उपज और आशीष बनी रहे।

आत्म-चिंतन के लिये कुछ प्रश्न

  • क्या मेरी कोशिशें अक्सर परिणामों में वास्तविक आशीष के बजाय निराशा लाती हैं? क्यों?
  • क्या मैं अपने जीवन में परमेश्वर के हृदय की आवाज़ को सुनने के लिए समय देता हूँ, विशेषकर सामाजिक अन्याय के बीच?
  • कैसे मैं अपने व्यवहार को धार्मिक आचरण के साथ संतुलित कर सकता हूँ ताकि परिणामों में स्थिरता आये?

संक्षिप्त निष्कर्ष

यिर्मयाह 12:13 हमारे लिए एक जागरूकता का पाठ है: कठिन परिश्रम और धार्मिक गतिविधियाँ तब तक प्रभावी नहीं जब हमारे हृदय में पाप, अन्याय और अविश्वास गहरे बैठे हों। परमेश्वर के क्रोध के कारण उपज में कमी एक चेतावनी है कि आत्म-निष्ठा और सामूहिक पवित्रता को पुनः स्थापित करना परमेश्वर की अनुमति से ही संभव है।

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यिर्मयाह 12:13 समानांतर पद और संबंधित वचन

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तू खेत में बीज तो बहुत सा ले जाएगा, परन्तु उपज थोड़ी ही बटोरेगा; क्योंकि टिड्डियाँ उसे खा जाएँगी।

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तू बोएगा, परन्तु लवनें न पाएगा; तू जैतून का तेल निकालेगा, परन्तु लगाने न पाएगा; और दाख रौंदेगा, परन्तु दाखमधु पीने न पाएगा। (यूह. 4:37, आमोस. 5:11, व्य. 28:38-40)

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तुम ने बहुत बोया परन्तु थोड़ा काटा; तुम खाते हो, परन्तु पेट नहीं भरता; तुम पीते हो, परन्तु प्यास नहीं बुझती; तुम कपड़े पहनते हो, परन्तु गरमाते नहीं; और जो मजदूरी कमाता है, वह अपनी मजदूरी की कमाई को छेदवाली थैली में रखता है।

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