Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
यिर्मयाह 17:1 यिर्मयाह 17:2 यिर्मयाह 17:3 यिर्मयाह 17:4 यिर्मयाह 17:5 यिर्मयाह 17:6 यिर्मयाह 17:7 यिर्मयाह 17:8 यिर्मयाह 17:9 यिर्मयाह 17:10 यिर्मयाह 17:11 यिर्मयाह 17:12 यिर्मयाह 17:13 यिर्मयाह 17:14 यिर्मयाह 17:15 यिर्मयाह 17:16 यिर्मयाह 17:17 यिर्मयाह 17:18 यिर्मयाह 17:19 यिर्मयाह 17:20 यिर्मयाह 17:21 यिर्मयाह 17:22 यिर्मयाह 17:23 यिर्मयाह 17:24 यिर्मयाह 17:25 यिर्मयाह 17:26 यिर्मयाह 17:27



पाठ का तत्काल संदर्भ
यिर्मयाह 17:6 शाप और आत्मा की कुहासा में कही हुई चेतावनी का हिस्सा है। पूरे अध्याय में नबी मनुष्य के हृदय की स्थिति और परमेश्वर पर निर्भरता बनाम मनुष्य-पर निर्भरता की तुलना कर रहा है। पृष्ठभूमि में दक्षिणी राज्य यहूदाह की धार्मिक और नैतिक पतन की समस्या है — लोग बाहरी धर्माचार्यताओं के साथ भी अपने हृदयों में परमेश्वर से मुंह मोड़ चुके हैं। इस आयत में बदलाव न होने पर अंजाम का डरावना चित्र प्रस्तुत किया गया है।
परमेश्वर और भरोसा का कौन सा सच प्रकट होता है?
आयत का मूल संदेश यह है कि जो व्यक्ति जीवित स्रोत—परमेश्वर—पर भरोसा नहीं करता, उसकी नियति काटे हुए, निर्जल और असमर्थ जीवन के समान होगी। यह पृथ्वी पर भौतिक संकट से बढ़कर आध्यात्मिक सूखापन दर्शाता है। परमेश्वर पर भरोसा जीवन को फलवान बनाता है; मद्धिम या क्षुराहीन आश्रय आत्म-नाश की ओर ले जाता है।
महत्वपूर्ण शब्द एवं रूपक
• "निर्जल देश के अधमरे पेड़" — यहाँ पेड़ जीवन और स्थायित्व का संकेत है; परिजन—वह जो सुस्त और नष्ट होता है—परमेश्वर के बिना जीवन की अक्षमता दिखाता है।
• "कभी भलाई न देखेगा" — यह न केवल अस्थायी तकलीफ बल्कि स्थायी परिणाम का संकेत है: धार्मिक अलगाव का फल निराशा और उबझना है।
• "निर्जल और निर्जन तथा लोनछाई भूमि" — तीनहरे शब्द स्थिति की तीव्रता बढ़ाते हैं: न केवल पानी की कमी, बल्कि साथी, उपकार और आश्रय की भी कमी।
संबंधित शास्त्र स्थान और सम्बन्ध
मत्ती हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क से संक्षिप्त उद्धरण
मत्ती हेनरी ने टिप्पणी में कहा है कि मनुष्य का प्रत्येक कर्म उसके हृदय के भरोसे से निकलता है; "जो परमेश्वर का आश्रय नहीं लेता, वह अन्ततः सूखा रहेगा" (संक्षेप)। अल्बर्ट बार्न्स ने इस प्रकार के रूपक को मानव निर्भरता के फल के रूप में व्याख्यायित किया कि यह स्थिति परित्याग और सहायता के अभाव की ओर ले जाती है। एडम क्लार्क ने नोट किया कि प्राचीन मध्यपूर्वी शुष्क भूमि का चित्रण सुनसान और खण्डर अवस्था का प्रतीक है। (यहाँ उद्धरण सारगर्भित और संक्षेप रूप में प्रस्तुत किया गया है।)
आधुनिक जीवन के लिए प्रयोग
यह आयत आज भी स्पष्ट प्रश्न पूछती है: आपकी आखिरी आश्रय कौन है? क्या आपकी पहचान, सुरक्षा और शांति किसी अस्थायी स्रोत—धन, प्रतिष्ठा, मानव समर्थन—पर टिकी है या जीवित परमेश्वर पर? जीवन के संकटों में जिनका भरोसा मजबूत है, वे कठिनाइयों के बावजूद स्थिर रह सकते हैं; अन्यथा वे विवश और सुनसान अनुभव करेंगे।
व्यावहारिक कदम:
निष्कर्षतः, यिर्मयाह 17:6 एक चेतावनी और प्रेरणा दोनों है: परमेश्वर से कटे रहने का परिणाम सूखे और परित्याग का है; अतः हमें अपना भरोसा स्थायी स्रोत पर केन्द्रित रखना चाहिए ताकि जीवन फलदायी और सुरक्षित बना रहे।