Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
यिर्मयाह 26:1 यिर्मयाह 26:2 यिर्मयाह 26:3 यिर्मयाह 26:4 यिर्मयाह 26:5 यिर्मयाह 26:6 यिर्मयाह 26:7 यिर्मयाह 26:8 यिर्मयाह 26:9 यिर्मयाह 26:10 यिर्मयाह 26:11 यिर्मयाह 26:12 यिर्मयाह 26:13 यिर्मयाह 26:14 यिर्मयाह 26:15 यिर्मयाह 26:16 यिर्मयाह 26:17 यिर्मयाह 26:18 यिर्मयाह 26:19 यिर्मयाह 26:20 यिर्मयाह 26:21 यिर्मयाह 26:22 यिर्मयाह 26:23 यिर्मयाह 26:24



यिर्मयाह 26:2 का अर्थ
इस वचन में यहोवा कहता है कि यरूसलों की उपस्थिति में यहोवा के भवन-आँगन में खड़े होकर, जो लोग यहोवा के भवन में दण्डवत् करने आते हैं, उनसे वही संदेश सुनाओ जिसे मैं तुझे देता हूँ, और उन बातों को छोड़ना मत। सीधे शब्दों में कहा गया है: परमेश्वर की प्रेषिति के द्वारा सच और स्पष्ट धर्मादेश; जो भी बोले या किया जाए उसकी परख सत्य के अनुसार हो।
संदर्भगत पृष्ठभूमि
यिर्मयah के समय यह मिस्र-योरूप के विरोधी सामाजिक-धार्मिक रिवाज और नगर-नगर की पग-पग पर प्रतिमा-आचार से उत्पन्न असंतोष की स्थिति थी। यिर्मयाह नबी यहोवा का संदेश लेकर आ रहे थे—कई बार ऐसा लगता था कि लोग पवित्र स्थल पर आकर भी बाह्य धर्म-व्यवहार के भीतर दिल से नहीं बदले। यहाँ प्रभु कह रहे हैं कि दण्डवत् करने के स्थान पर सतहपराशी बिना-विश्वास, स्वार्थपरक धर्म की शांति बनती दिखती है, परन्तु परमेश्वर की बातें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं और वही आचार-विधि की कसौटी हैं।
व्याख्यात्मक बिंदु
कथन-थीमैटिक सार
1) धर्म-कर्म का सही स्वरूप बाह्य-चिन्हों से नहीं, बल्कि परमेश्वर के शब्दों के पालन से बनता है। 2) नबी की ईमानदार घोसणा विश्वासयोग्य स्थिति बनाती है, भले ही उसे बाधाओं का सामना क्यों न करना पड़े। 3) नगर-जनमानस के सम्मुख नैतिक सचाई प्रस्तुत करना परमेश्वर की इच्छा है, ताकि लोग सचेत हों और पथ पर लौटें।
संबद्ध बाइबल संदर्भ
- यह्रूशलेम में मंदिर-आँगन के प्रति चेतावनियाँ: यहोवा के भवन की पवित्रता और धार्मिक मानदंडों के पालन की मांग दर्शाती हैं।
- नबीय चेतावनियाँ और समाज-रद्द: सत्य भाषण की आवश्यकता और परिणामस्वरूप समुदाय के आचरण में बदलाव की उम्मीद बताती हैं।
- पवित्रस्थान के प्रति आचरण की कठोरता: दूर-दूर तक पवित्र स्थलों के प्रति आस्थावानों के व्यवहार का परीक्षण।
व्यावहारिक निष्कर्ष
1) हर धार्मिक कार्यक्रम के साथ आत्म-चिंतन जरूरी है: क्या हमारी प्रतिज्ञा और प्रार्थनाएँ दिल से हैं या केवल दिखावे के लिए?
2) सत्य और स्पष्टता के साथ का संदेश आज भी प्रासंगिक है: सभा-चर्चा, परिवार, और समाज में जो भी बोलना हो वह सत्य हो।
cross-references
- मत्ती 15:8-9—औचित्य से बाहर के मानक पर आधारित धर्म के खतरे। समझिए कि आस्था के गहरे नियम और जीवन की व्यवहारिकता एक साथ चाहिए।
- हबक्कुक 2:4—ईमानदारी और विश्वास की भूमिका, जो लोगों को परमेश्वर के लिए सचेत बनाती है।
- भजन 24:3-4—खोज और स्वीकृति के लिए दिल की पवित्रता आवश्यक है; बाहर के देव-स्वरूप से नहीं, भीतर की पवित्रता से प्रार्थना स्वीकार होती है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 26:2 हमें याद दिलाता है कि परमupukेश्वर के भवन में आकर भी हमारा आचरण और विवेक सत्य के अनुरूप होना चाहिए। नबी की स्पष्टता और जन-समुदाय की प्रतिक्रिया इसी सत्य पर टिकी है। जीवन में भी यही चाहिए: बाहरी धर्म के साथ आंतरिक समर्पण और सत्य के साथ चालना।